अब्दाली की लूट - Invasion of Ahmad Shah Abdali

अब्दाली की लूट – Invasion of Ahmad Shah Abdali

अब्दाली आज बहुत खुश था। उस ने इस युवक से धर्म, राजनीति और साहित्य पर चर्चा की। सब क्षेत्रों में उस विव्दता देख कर वह बहुत प्रसन्न हुआ और उसे काबुल का सूबेदार बना दिया। सुखजीवन पहला हिंदू था जो काबुल का सूबेदार बना और वह भी अब्दाली के जमाने में! मनुष्य के पास यदि बुद्धि और योगयता हो तो वह क्या नहीं पा सकता?

कुछ साल तक सुखजीवन ने बड़ी बुद्धिमानी और कुशलता से काबुल का शासनप्रबंध किया। अब्दाली उस के प्रबंध कौशल को देख अत्यंत प्रसन्न हुआ। इसी बीच जब दिल्ली के मुगल बादशाह से वह कश्मीर के सूबे को छीन लाया वहां के प्रबंध की जरूरत हुई। इस नए जीते हुए प्रदेश में किसी अत्यंत योग्य प्रशासक की आवश्यकता थी। अब्दाली को सुखजीवन ही एकमात्र योग्य विश्वस्त व्यक्ति लगा, इसलिए उस ने उसे ही कश्मीर का सूबेदार बना दिया। सुखजीवन अपनी सहायता के लिए बहुत से सुयोग्य ब्राहाणों को ले कर कश्मीर चला आया। यह सन 1758 की बात है।

अब्दाली का ध्यान कुछ सालों के लिए कश्मीर से हट कर फिर पंजाब पर अटक गया। सिखों के कारण उस की नाक में दम आ गया था। उन्होंने अब्दाली की नाक में इतना दम कर दिया कि शायद इसी दबाव के कारण उस बेचारे की नाक में फोड़ा हो गया। फोड़ा सड़ गया। कीड़े पड़ गए और अब उस में से बदबू भी आने लगी। इस फोड़े के कारण अब्दाली की सारी शक्लसूरत ही बिगड़ गई। अब उस के सामने एक ओर नया सरदर्द खड़ा हो गया। अब तक तो पंजाब में सिर्फ सिख ही ऊधम मचा रहे थे, अब मराठा सरदार राधोवा भी आ धमका था। उसने लौहार, मुलतान और अटक पर अधिकार कर के शिवाजी के सपने को पूरा दिया। इस प्रकार सन 1759 में अटक के किले पर पेशवा का झंडा फहराने के साथ-साथ मराठा शक्ति अपने चरम उत्कर्ष पर पहुंच गई।

मराठों ने अफगानों को मार कर पंजाब से बाहर खदेड़ दिया। यह अब्दाली के लिए खुली चुनौती थी, उस ने स्वीकार कर लिया और मराठों का सामना करने के लिए तैयारियां शुरू कर दीं। सन 1760 में वह 60 हजार घुड़सवार ले कर निकला। 14 जनवरी, 1761 के दिन पानीपत का वह घमासान युद्ध हुआ जिस ने हिंदुस्तान के इतिहास को ही बदल दिया। इस पराजय से पेशवा को इतना धक्का लगा कुछ दिनों बाद ही उस की मृत्यु हो गयी। पानीपत की पराजय के बाद मराठा संघ बिखर गया और बंगाल में यूरोप के सफ़ेद डाकुओं के लिए अपनी लूट मचाने और सारे भारत को जितने का स्वप्न साकार करने का रास्ता खुल गया।

जब अब्दाली पानीपत के मैदान में मराठों से निपट रहा था तो सिखों को मनचाहा मौका मिल गया। उन्होंने लाहौर को लूट लिया। लाहौर की यह दुर्दशा देख अब्दाली बहुत कुलबुलाया। उस ने अपने सेनापति नूरुद्दीन को सेना दे कर सिखों का दमन करने भेजा और खुद काबुल लौट गया। सिखों ने भीमसिंह और रूपसिंह के कुशल नेतृत्व में पठानों से मोर्चा लिया और नुरुद्दीन को हरा कर पंजाब पर अपना अधिकार कर लिया।

अब्दाली ने पंजाब से सिखों का नामोनिशान मिटाने के लिए तीन बार और पंजाब पर हमले किए पर सिखों की शक्ति न टूटी. अब्दाली की पीठ फिरते ही वे फिर प्रबल हो जाते। एक बार अफगानों ने अमृतसर पर हमला कर के हजारों सिखों को कत्ल डाला और उन के सुप्रसिद्ध तीर्थ हरमिंदर साहिब (स्वर्णमंदिर) के अमृत सरोवर में गो हत्या का सरोवर का सारा जल गायों के खून से रंग दिया।

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