आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले में स्थित श्रीकालहस्ती मंदिर दक्षिण भारत के उन प्राचीन शिव मंदिरों में शामिल है, जहां आस्था, स्थापत्य और पौराणिक कथाएं एक-दूसरे में इस तरह घुली-मिली हैं कि मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि भारतीय वास्तुकला और धार्मिक परंपरा का जीवंत दस्तावेज नजर आता है।
भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर ‘श्रीकालहस्तीश्वर‘ के नाम से प्रसिद्ध है और इसे ‘दक्षिण कैलाश‘ भी कहा जाता है। पंचभूत स्थलों में शामिल इस मंदिर का संबंध ‘वायु तत्व’ से है। यहां स्थापित शिवलिंग को वायु लिंग माना जाता है और इसी विशेषता के कारण यह मंदिर शिवभक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
श्रीकालहस्ती मंदिर, तिरुपति जिला, आंध्र प्रदेश
| Name: | श्रीकालहस्ती मंदिर (Srikalahasti Temple) |
| Location: | Srikalahasti, Tirupati DIstrict, Andhra Pradesh 517644 India |
| Deities: | Shiva (Srikalahasteeswara), Parvati (Gnana Prasunambika Devi) |
| Affiliation: | Hinduism |
| Festival: | Maha Shivaratri |
| Architecture: | Dravidian architecture |
| www: | srikalahasthitemple.com |
| Established: | 5th century CE |
| Created By: | Rajendra Chola I |
गुफानुमा गर्भगृह में विराजमान वायु लिंग
श्रीकालहस्ती मंदिर की सबसे खास विशेषता इसका गर्भगृह है। सामान्य शिव मंदिरों की तुलना में यहां का गर्भगृह गुफानुमा संरचना लिए हुए है।
इसी पवित्र कक्ष में वायु लिंग स्थापित है। मंदिर की मान्यता के अनुसार गर्भगृह में मौजूद प्राकृतिक वायु प्रवाह शिवलिंग को लगातार स्पर्श करता रहता है। यही कारण है कि इसे वायु तत्व का प्रतीक माना जाता है।

यहां शिवलिंग के दर्शन करते समय भक्तों का ध्यान सबसे पहले इसकी रहस्यमय और आध्यात्मिक उपस्थिति की ओर जाता है। गर्भगृह में बाहरी हवा के सामान्य प्रवेश की गुंजाइश न होने के बावजूद प्राकृतिक वायु का अनुभव होना मंदिर की विशेष धार्मिक मान्यता का हिस्सा है। इसी वजह से श्रीकालहस्ती का शिवलिंग पंचभूत स्थलों में अपनी अलग पहचान रखता है।
गर्भगृह की संरचना भी मंदिर की वास्तुकला को विशिष्ट बनाती है। यहां एक प्राकृतिक वायु मार्ग के साथ छत में छोटा-सा खुला स्थान भी बताया जाता है, जिसके माध्यम से वर्ष के कुछ विशेष समय में सूर्य की किरणें शिवलिंग तक पहुंचती हैं। इस तरह मंदिर की रचना में प्रकृति के तत्वों – वायु और सूर्य को धार्मिक प्रतीकों के साथ जोड़ा गया है।
120 फुट ऊंचा राजगोपुरम
श्रीकालहस्ती मंदिर का बाहरी स्थापत्य इसकी भव्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। लगभग 23 एकड़ में फैले इस मंदिर परिसर में कई प्रवेश द्वार और गोपुरम हैं।
इनमें सबसे प्रमुख ‘राजगोपुरम‘ है, जो करीब 120 फुट ऊंचा और 9 मंजिला बताया जाता है। इसकी ऊंचाई और विशाल संरचना दूर से ही मंदिर की भव्यता का एहसास करा देती है।
राजगोपुरम पर देवी-देवताओं, पशु-पक्षियों, पुष्प आकृतियों और पौराणिक प्रसंगों की बारीक नक्काशी देखने को मिलती है। इसकी स्थापत्य शैली पर विजयनगर काल का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। मंदिर के निर्माण और विस्तार में अलग-अलग राजवंशों का योगदान रहा, जिसके कारण परिसर में स्थापत्य की कई परंपराओं का मेल दिखाई देता है।
पल्लवों, चोलों और विजयनगर शासकों
ने समय-समय पर मंदिर में निर्माण, विस्तार और जीर्णोद्धार का कार्य कराया। यही वजह है कि यहां के गोपुरम, मंडप, स्तंभ और मूर्तियां दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला के विकास की कहानी भी सुनाते हैं।
नक्काशीदार स्तंभों में जीवंत होती पौराणिक कथाएं
मंदिर परिसर में बने विभिन्न मंडप स्थापत्य कला को और समृद्ध करते हैं। नंदी मंडप, राहु-केतु मंडप, कल्याण मंडप और ऊंजल मंडप जैसे कई मंडप अपने अलग उद्देश्य और कलात्मक विशेषताओं के लिए जाने जाते हैं।
शिवलिंग से जुड़ी मकड़ी, नाग और हाथी की कथा
श्रीकालहस्ती नाम के पीछे भी एक बेहद रोचक कथा जुड़ी है। मान्यता है कि एक मकड़ी, एक नाग और एक हाथी भगवान शिव के भक्त थे। मकड़ी शिवलिंग के ऊपर अपने जाल से छाया करती थी, नाग शिवलिंग को रत्नों से सजाता था और हाथी जल तथा फूल अर्पित करता था।
एक दिन हाथी ने अनजाने में मकड़ी का जाला और नाग के चढ़ाए रत्न हटा दिए। इसके बाद तीनों के बीच संघर्ष हुआ और अंततः उन्होंने अपने प्राण गंवा दिए। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें मोक्ष प्रदान किया। ‘श्री’ का संबंध मकड़ी, ‘काला’ का नाग और ‘हस्ति’ का हाथी से जोड़ा जाता है।
इसी से मंदिर का नाम श्रीकालहस्ती पड़ा। मंदिर की परंपरा में इस कथा की स्मृति आज भी दिखाई देती है। मुख्य गर्भगृह के द्वार पर इन तीनों भक्तों से जुड़े प्रतीक इस प्राचीन कथा को स्थापत्य का हिस्सा बना देते हैं।
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