बाल-कविताएँ [3] – आसमान छू लेंगी: डॉ. कविता विकास
बतलाते हैं कि
आंखों पे चढ़ा चश्मा भी
अब काम नहीं करता है।
कमर झुक कर
घुटनों से मिल गया है
उसके आंगन की चिड़ियां
उसके इर्द-गिर्द फुदकती हैं
उनकी चहचहाहट से
उसके चेहरे का बिता
दर्प लौट आता है
बादलों के बीच से
उतरती परियों की कहानीयां सुनकर
उसकी नातिनें बोल उठती हैं
हम स्वर्ग लोक नहीं आई हैं
चढती धूप सी
महमहाती हवाओं सी
रंग- बिरंगे परिंदों सी
हम भी आसमान छू लेंगी।
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