कामायनी – जयशंकर प्रसाद

हिम गिरी के उत्तंग शिखर पर‚
बैठ शिला की शीतल छांह‚
एक पुरुष‚ भीगे नयनों से‚
देख रहा था प्र्रलय प्रवाह!

नीचे जल था‚ ऊपर हिम था‚
एक तरल था‚ एक सघन;
एक तत्व की ही प्रधानता‚
कहो उसे जड़ या चेतन।

दूर दूर तक विस्तृत था हिम
स्तब्ध उसी के हृदय समान;
नीरवता सी शिला चरण से
टकराता फिरता पवमान।

तरुण तपस्वी–सा वह बैठा‚
साधन करता सुर श्मशान;
नीचे प्रलय सिंधु लहरों का‚
होना था सकरुण अवसान।

उसी तपस्वी से लम्बे‚ थे
देवदारु दो चार खड़े;
हुए हिम धवल‚ जैसे पत्थर
बन कर ठिठुरे रहे अड़े।

अवयव की दृढ़ मांस–पेशियां‚
ऊर्जस्वित था वीय्र्य अपार;
स्फीत शिराएं‚ स्वस्थ रक्त का
होता था जिनमें संचार।

चिंता–कातर वदन हो रहा
पौरुष जिसमे ओत प्रोत;
उधर उपेक्षामय यौवन का
बहता भीतर मधुमय स्रोत।

बंधी महा–वट से नौका थी
सूखे में अब पड़ी रही;
उतर चला था वह जल–प्लावन‚
और निकलने लगी मही।

निकल रही थी मर्म वेदना‚
करुणा विकल कहानी सी;
वहां अकेली प्रकृति सुन रही‚
हंसती सी पहचानी सी।

∼ जयशंकर प्रसाद

About Jaishankar Prasad

जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी 1889 - 14 जनवरी 1937) हिन्दी कवि, नाटकार, कथाकार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई और वह काव्य की सिद्ध भाषा बन गई। आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में इनके कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। वे एक युगप्रवर्तक लेखक थे जिन्होंने एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरव करने लायक कृतियाँ दीं। कवि के रूप में वे निराला, पन्त, महादेवी के साथ छायावाद के चौथे स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हुए है; नाटक लेखन में भारतेंदु के बाद वे एक अलग धारा बहाने वाले युगप्रवर्तक नाटककार रहे जिनके नाटक आज भी पाठक चाव से पढते हैं। इसके अलावा कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी उन्होंने कई यादगार कृतियाँ दीं। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करूणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन। 48 वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएं की। उन्हें ‘कामायनी’ पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था। उन्होंने जीवन में कभी साहित्य को अर्जन का माध्यम नहीं बनाया, अपितु वे साधना समझकर ही साहित्य की रचना करते रहे। कुल मिलाकर ऐसी विविध प्रतिभा का साहित्यकार हिंदी में कम ही मिलेगा जिसने साहित्य के सभी अंगों को अपनी कृतियों से समृद्ध किया हो।

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