जलाते चलो: द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी - आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हुई हिंदी कविता

जलाते चलो: द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी – आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हुई हिंदी कविता

‘जलाते चलो’ कविता में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने दीपक के माध्यम से साहस, संघर्ष और आशा का संदेश दिया है। यह कविता हमें अज्ञान रूपी अंधकार से न घबराने और निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। दिए का उदाहरण देकर कवि चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करता है। कवि कहता है कि एक छोटी-सी उम्मीद भी बड़ी-बड़ी कठिनाइयों को हराकर जीत दिला सकती है। कवि लोगों को ज्ञान रूपी दीयों में प्रेम रूपी तेल भर-भर कर डाल कर जलाने को प्रेरित कर रहा है क्योंकि कवि के अनुसार ज्ञान और प्रेम से कभी न कभी तो इस धरती की नफ़रत और बुराइयाँ समाप्त होंगी।

आज विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि अमावस्या जैसी अँधेरी रात में पूर्णिमा जैसा उजाला करना संभव है। परन्तु इतना उन्नत होने पर भी आज विश्व में अमावस्या जैसा अन्धकार फैला हुआ है, अर्थात प्रकृति से लगातार खिलवाड़ करने व् विनाशकारी हथियारों के निर्माण के कारण हर ओर दुःख व् निराशा का माहौल है। आज विज्ञान ने रोशनी फैलाने वाले कई उपकरण बना दिए हैं। उन उपकरणों से सही रास्ता दिखाने वाला ज्ञान रूपी प्रकाश नहीं मिल सकता। इसलिए कवि उन्हें बुझा कर ज्ञान रूपी प्रकाश वाले दीपक जलाने को कह रहा है। ज्ञान के रास्ते पर चलते-चलते एक न एक दिन अज्ञान से मुक्ति मिल ही जाती है इसलिए कवि लगातार ज्ञान के पथ पर चलने को कह रहा है।

ज्ञान व् संघर्ष को अज्ञान, लालच, स्वार्थ जैसी बुराइयाँ अक्सर मिटाने का प्रयास करती रहती हैं। ज्ञान रूपी मार्ग दिखाने वाले महापुरुषों को अज्ञानी व् पाखंडियों ने मरवा दिया या झूठा साबित कर दिया जिसके कारण कई विरोधियों ने हम पर शासन किया किन्तु उन्हीं महापुरुषों के ज्ञान को सीख रूप में लेकर नई पीढ़ियों ने अज्ञान रूपी अन्धकार को ज्ञान रूपी उजाले में परिवर्तित किया। संघर्ष और प्रेम की कहानी सदियों पुरानी है और ये भविष्य में भी चलती रहेगी क्योंकि संघर्ष और प्रेम व् आशा जीवन के दो पहलू हैं। ज्ञान कभी समाप्त नहीं होता। ज्ञान सदैव चमकता रहता है। यदि धरती पर एक भी ज्ञान रूपी दिया प्रेम रूपी तेल से भरा रहेगा वह अज्ञान रूपी रात को उम्मीद रूपी सवेरा दिखाता रहेगा।

जलाते चलो: द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

जलाते चलो ये दिये स्नेह भर-भर
कभी तो धरा का अँधेरा मिटेगा।

भले शक्ति विज्ञान में है निहित वह
कि जिससे अमावस बनें पूर्णिमा-सी,
मगर विश्व पर आज क्यों दिवस ही में
घिरी आ रही है अमावस निशा-सी।

बिना स्नेह विधुत-दिये जल रहे जो
बुझाओं इन्हें, यों न पथ मिल सकेगा।

जला दीप पहला तुम्हीं ने तिमिर की
चुनौती प्रथम बार स्वीकार की थी,
तिमिर की सरित पार करने तुम्हीं ने
बना दीप की नाव तैयार की थी।

बहाते चलो नाव तुम वह निरंतर
कभी तो तिमिर का किनारा मिलेगा।

युगों से तुम्हीं ने तिमिर की शिला पर
दिये अनगिनत है निरंतर जलाए,
समय साक्षी है कि जलते हुए दीप
अनगिन तुम्हारे पवन ने बुझाए।

मगर बुझ स्वयं ज्योति जो दे गए वे
उसी से तिमिर को उजेला मिलेगा।

दिये और तुफ़ान की यह कहानी
चली आ रही और चलती रहेगी,
जली जो प्रथम बार लौ दीप की
स्वर्ण-सी जल रही और जलती रहेगी।

रहेगा धरा पर दिया एक भी यदि
कभी तो निशा को सवेरा मिलेगा।

~ द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

इस कविता का मुख्य विषय साहस, संघर्ष, और उम्मीद का संदेश है। द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने दीपक को उदाहरण बनाकर समाज में एक सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया है। इस कविता के माध्यम से कवि ने मानव को प्रेम भरी ज्ञान की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया है। कवि सन्देश देते हैं कि जब तक हम प्रेम रूपी ज्ञान के दीपक प्रज्वलित नहीं करेंगे, तब तक बुराइयाँ, निराशा हम पर हावी होती रहेंगी।

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