जल – किशन सरोज

नींद सुख की फिर हमे सोने न देगा
यह तुम्हारे नैन में तिरता हुआ जल।

छू लिये भीगे कमल, भीगी ऋचाएँ
मन हुए गीले, बहीं गीली हवाएँ।
बहुत संभव है डुबो दे सृष्टि सारी,
दृष्टि के आकाश में घिरता हुआ जल।

हिमशिखर, सागर, नदी, झीलें, सरोवर,
ओस, आँसू, मेघ, मधु, श्रम, बिंदु, निर्झर,
रूप धर अनगिन कथा कहता दुखों की
जोगियों सा घूमता फिरता हुआ जल।

लाख बाँहों में कसें अब यह शिलाएँ,
लाख आमंत्रित करें गिरी कंदराएँ।
अब समंदर तक पहुँचकर ही रुकेगा,
पर्वतों से टूटकर गिरता हुआ जल।

∼ किशन सरोज

About Kishan Saroj

आजादपुरम, छावनी, अशरफ खां रोड, बरेली-243122, फोन : 0581-541004 किशन सरोज गीत विधा के रागात्मक भाव के कवि हैं। इन्होंने अब तक लगभग ४०० गीत लिखे हैं। इनके प्रेमपरक गीत सहज अभिव्यंजना एवं नवीन उत्प्रेक्षाओं के कारण मर्मस्पर्शी हैं।

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