बागन काहे को जाओ पिया - रसखान

बागन काहे को जाओ पिया – रसखान

बागन काहे को जाओ पिया
घर बैठे ही बाग लगाए दिखाऊँ
एड़ी अनार–सी मौर रही
बहियाँ दोउ चम्पे–सी डार नवाऊँ।

छातिन मैं रस के निबुआ
अरु घूँघट खोल के दाख चखाऊँ
ढाँगन के रस के चसके
रति फूलनि की रसखानि लुटाऊँ।

अंगनि अंग मिलाइँ दोऊ
रसखान रहे लिपटे तरु छाहीं
संगनि संग अनंग को रंग
सुरंग सनी पिय दे गलबाँहीं।

बैन ज्यौं मैन सुएन सनेह की
लूटि रहे रति अंतर जाहीं
नीबी गहै कुच कंचन कुंभ
कहै बनिता पिय नाहीं जु नाहीं।

∼ रसखान

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