अंधा युग - धर्मवीर भारती

अंधा युग – धर्मवीर भारती

पहला अंक — कौरव नगरी

(तीन बार तूर्यनाद के उपरान्त कथा-गायन)

टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा
उसको दोनों ही पक्षों ने तोड़ा है
पाण्डव ने कुछ कम कौरव ने कुछ ज़्यादा
यह रक्तपात अब कब समाप्त होना है

यह अजब युद्ध है नहीं किसी की भी जय
दोनों पक्षों को खोना ही खोना है
अन्धों से शोभित था युग का सिंहासन
दोनों ही पक्षों में विवेक ही हारा

दोनों ही पक्षों में जीता अन्धापन
भय का अन्धापन, ममता का अन्धापन
अधिकारों का अन्धापन जीत गया
जो कुछ सुन्दर था, शुभ था, कोमलतम था
वह हार गया… द्वापर युग बीत गया।

है कुरूक्षेत्र से कुछ भी खबर न आयी
जीता या हारा बचा–खुचा कौरव–दल
जाने किसकी लोथों पर जा उतरेगा
यह नरभक्षी गिद्धों का भूखा बादल

अन्तपुर में मरघट की–सी खामोशी
कृश गान्धारी बैठी है शीश झुकाये
सिंहासन पर धृतराष्ट्र मौन बैठे हैं
संजय अब तक कुछ भी संवाद न लाये।

आसन्न पराजय वाली इस नगरी में
सब नष्ट हुई पद्धतियाँ धीमे–धीमे
यह शाम पराजय की, भय की, संशय की
भर गये तिमिर से ये सूने गलियारे

जिनमें बूढ़ा झूठा भविष्य याचक–सा
है भटक रहा टुकड़े को हाथ पसारे
अन्दर केवल दो बुझती लपटें बाकी
राजा के अन्धे दर्शन की बारीकी

या अन्धी आशा माता गान्धारी की
वह संजय जिसको वह वरदान मिला है
वह अमर रहेगा और तटस्थ रहेगा
जो दिव्य दृष्टि से सब देखेगा समझेगा

जो अन्धे राजा से सब सत्य कहेगा।
जो मुक्त रहेगा ब्रम्हास्त्रों के भय से
जो मुक्त रहेगा, उलझन से, संशय से
वह संजय भी

इस मोह–निशा से घिर कर
है भटक रहा
जाने किस
कंटक–पथ पर।

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