अगर होता मैं – राहुल राज पसरीचा

गर होता मै नन्हा पंछी,
छूता नभ को पंख पसार।
डालो पर भी गाता रहता,
आ जाती जब मस्त बहार।

गर होता मै फूल बाग का,
जग को मै सिखलाता प्यार।
मिट न सके गंध ये मेरी,
देता सब को ये उपहार॥

गर होता मै शूल फूल का,
सबको मै सिखलाता वार।
शत्रु को काम कभी न समझो,
शस्त्र को देते रहना धार॥

गर होता मै छोटी नैया,
सबको मै ले जाता पार।
मंजिल पास तभी आती जब,
राह में आती है मझधार॥

वृक्ष नीम का होता गर मै,
औषध से करता उपचार।
आश्रय भी देता मै सबको,
छाया देता सदा अपार॥

रेशम का गर कीट जो होता,
दे जाता रेशम का तार।
ऐसा ही कुछ कम् करूँ मै,
याद करे जो ये संसार॥

∼ राहुल राज पसरीचा

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