ये मेरे एक शादीसुदा मित्र ने भेजा है, मुझे दोष मत दीजियेगा तथ्य हैं कि सभी सम्बन्ध… भाई-बहन, मॉ-बाप, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, दोस्त-दोस्ती सच्चे हैं! झूठा सम्बन्ध एक ही हैं वह पति-पत्नि का हैं? सारे सम्बन्ध प्राकृतिक हैं, बने-बनाये मिलते हैं! अप्राकृतिक सम्बन्ध एक ही हैं जिसे बहुत प्रयासों से बनना पड़ता हैं, वह पति-पत्नि का हैं? सारे सम्बन्ध बिना किसी …
Read More »बम बम भोला हो शिवजी बिहाने चले – शैलेन्द्र
बम बम भोला बम बम भोला बम बम भोला बम बम भोला हो शिवजी बिहने चले पालकी सजायके भभूति लगाए के ला ओ शिवजी बिहाने चले पालकी सज़ायक़े भभूति लगाए के पालकी सज़यक़े ला ओ जब शिव बाबा करे तैयारी कैके सकल समान हो दाहिने अंग त्रिशूल विराजे नाचे भूत शैतान हो ब्रह्मा चले विष्णु चले लाई के वेद पुराण …
Read More »कोशिश कर, हल निकलेगा
कोशिश कर, हल निकलेगा। आज नही तो, कल निकलेगा। अर्जुन के तीर सा सध, मरूस्थल से भी जल निकलेगा।। मेहनत कर, पौधो को पानी दे, बंजर जमीन से भी फल निकलेगा। ताकत जुटा, हिम्मत को आग दे, फौलाद का भी बल निकलेगा।। जिन्दा रख, दिल में उम्मीदों को, गरल के समन्दर से भी गंगाजल निकलेगा। कोशिशें जारी रख कुछ कर …
Read More »अकड़ – दीनदयाल शर्मा
अकड़-अकड़ कर क्यों चलते हो चूहे चिंटूराम, ग़र बिल्ली ने देख लिया तो करेगी काम तमाम, चूहा मुक्का तान कर बोला नहीं डरूंगा दादी मेरी भी अब हो गई है इक बिल्ली से शादी। ∼ दीनदयाल शर्मा
Read More »अपुन बोला तू मेरी लैला – जोश
अपुन बोला तू मेरी लैला वो बोली फेंकता है साला अपुन जब ही सच्ची बोलता ऐ उसको झूठ काई को लगता है॥ ये उसका स्टाइल होइंगा होठों पे ना दिल में हाँ होइंगा ये उसका स्टाइल होइंगा होठों पे ना दिल में हाँ होइंगा आज नहीं तो कल बोलेगी ऐ तू टेंशन काई को लेता रे॥ अपुन बोला तू मेरी …
Read More »अपना गाँव – निवेदिता जोशी
मैं अपने गाँव जाना चाहती हूँ… जाड़े की नरम धूप और वो छत का सजीला कोना नरम-नरम किस्से मूँगफली के दाने और गुदगुदा बिछौना मैं अपने गाँव जाना चाहती हूँ… धूप के साथ खिसकती खटिया किस्सों की चादर व सपनों की तकिया मैं अपने गाँव जाना चाहती हूँ… दोस्तों की खुसफुसाहट हँसी के ठहाके यदा कदा अम्मा व जिज्जी के …
Read More »अनकहे गीत – मनोहर लाल ‘रत्नम’
प्रेम के गीत अब तक हैं गाये गये। दर्द के गीत तो, अनकहे रह गये॥ द्रोपदी पिफर सभा में, झुकाये नजर, पाण्डवों का कहां खो गया वो असर। फिर शिशुपाल भी दे रहा गालियां, कृष्ण भी देख कर देखते रह गये। दर्द के गीत तो, अनकहे रह गये॥ विष जो तुमने दिया, उसको मैंने पिया, पीर की डोर से, सारा …
Read More »अँधेरे का दीपक – हरिवंश राय बच्चन
है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है? कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था, भावना के हाथ से जिसमें वितानों को तना था, स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा, स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था, ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर कंकड़ों को एक अपनी शांति की …
Read More »अनोखा घर – प्रतिक दुबे
सबका अपना होता है, सबको रहना होता है, और जहाँ सुख-दुःख होता है, वह अनोखा घर होता है। चार-दीवार के अंदर रहते सब, समय पता नही बीत जाता है कब, वह अनोखा घर होता है। जहाँ सब अपना काम करते है, मिल-जुलकर साथ हमेशा रहते है, वह अनोखा घर होता है। आज मनुष्य की हरकतों से घर बिखरता जा रहा …
Read More »अमरुद बन गए – डॉ. श्री प्रसाद
आमों के अमरुद बन गए अमरूदों के केले मैंने यह सब कुछ देखा है आज गया था मेले बकरी थी बिलकुल छोटी सी हाथी की थी बोली मगर जुखाम नहीं सह पाई खाई उसने गोली छत पर होती थी खों खों खों मगर नहीं था बन्दर बिल्ली ही यों बोल रही थी परसो मेरी छत पर गाय नहीं करती थी …
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