अंग्रेजों की गोलियाँ खाकर भी पेड़ पर फहराया तिरंगा, कहानी गुलाब सिंह लोधी और ‘झंडेवाला पार्क’ की: बलिदान दिवस पर CM योगी ने दी श्रद्धांजलि
गुलाब सिंह लोधी (Gulab Singh Lodhi) के बलिदान दिवस पर सीएम योगी ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाए। करीब 9 दशक पहले यही गुलाब सिंह लोधी थे, जिन्होंने अंग्रेजी बन्दूकों की परवाह किए बिना लखनऊ के अमीनाबाद पार्क में तिरंगा फहरा दिया था।
लखनऊ में सीएम योगी आदित्यनाथ 23 अगस्त 2026 को अमर बलिदानी गुलाब सिंह लोधी की प्रतिमा पर पहुँचे। उनके बलिदान दिवस पर सीएम ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाए और उन्हें याद किया। करीब 9 दशक पहले यही गुलाब सिंह लोधी थे, जिन्होंने अंग्रेजी बन्दूकों की परवाह किए बिना लखनऊ के अमीनाबाद पार्क में तिरंगा फहरा दिया था। बदले में अंग्रेजों ने उन्हें गोलियों से भून डाला, मगर उनके हाथों में लहराता झंडा उस वक्त अंग्रेज हुकूमत को सीधी चुनौती दे चुका था।
गुलाब सिंह लोधी: महान क्रांतिकारी, स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी
| Name: | गुलाब सिंह लोधी (Gulab Singh Lodhi / Gulab Singh Lodha) |
| Born: | 1903 – Unnao, Uttar Pradesh, India |
| Death: | 23 August 1935 (aged 32) – Aminabad, Lucknow, India |
| Father: | Thakur Ram Ratan singh Lodhi |
| Religion: | Hindu |
| Occupation: | Freedom Fighters |
गुलाब सिंह लोधी की कहानी महज एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कहानी भर नहीं है, ये उस दौर की झलक है जब गाँव-गाँव से उठे मामूली किसान-मजदूर भी अंग्रेजों के खिलाफ अपनी जान दाँव पर लगाने से पीछे नहीं हटते थे। इतिहास की किताबों में बड़े-बड़े नाम तो दर्ज हैं, पर गुलाब सिंह लोधी जैसे कई सेनानी ऐसे भी रहे, जिनकी कहानी स्थानीय यादों में तो रही, मगर राष्ट्रीय पटल पर उन्हें वो जगह कभी नहीं मिली, जिसके वो हकदार थे।
भारत माता के महान सपूत, अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी जी ने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर माँ भारती की आन-बान और शान को अक्षुण्ण रखा।
आज उनके पावन बलिदान दिवस पर लखनऊ में उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी जी की पुण्य… pic.twitter.com/khOXWt508M
— Yogi Adityanath (@myogiadityanath) August 23, 2026
उन्नाव की माटी से निकला था ये वीर
साल 1903 में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे गुलाब सिंह लोधी उन्नाव जिले के फतेहपुर चौरासी इलाके के चंद्रिकाखेड़ा गाँव के रहने वाले थे। पिता का नाम था ठाकुर रामरतन सिंह लोधी।
उनका बचपन ऐसे समय में बीता, जब अंग्रेजी राज के खिलाफ गुस्सा हर तरफ पनप रहा था। असहयोग आँदोलन, सत्याग्रह, स्वदेशी की हवा गाँवों तक पहुँच चुकी थी। अंग्रेजों की सख्ती और क्रूरता के खिलाफ माहौल पूरे देश में बन रहा था, और गुलाब सिंह लोधी भी इसी हवा में साँस ले रहे थे।

जब तिरंगा अंग्रेजों के लिए खतरा बन गया
गुलाब सिंह लोधी का नाम सबसे ज्यादा जुड़ा है लखनऊ के झंडा सत्याग्रह से। उस दौर में तिरंगा फहराना अपने आप में बगावत मानी जाती थी। अंग्रेज सरकार झंडे से जुड़े आंदोलनों को बेहद संजीदगी से लेती थी, और ऐसे किसी भी जमावड़े को रोकने के लिए पुलिस-फौज उतार देती थी।
उसी दौर में उन्नाव से सत्याग्रहियों के कई जत्थे लखनऊ की तरफ कूच कर गए। मकसद था तिरंगा फहराना, अंग्रेजी सत्ता के मुँह पर राष्ट्रीय स्वाभिमान का तमाचा जड़ना मगर अंग्रेज फौज ने रास्ता रोक दिया। कई सत्याग्रही वहीं रुक गए, आगे नहीं बढ़ सके।
गुलाब सिंह लोधी रुकने वालों में नहीं थे
वे सैनिकों की नजर बचाकर किसी तरह अमीनाबाद पार्क में घुस गए। साथ में था सिर्फ एक पैना (पतली लाठी, छड़ी), वही ‘औजार’ जिससे किसान बैलों को हाँकते हैं। इसी में उन्होंने तिरंगा बाँध रखा था। इरादा एक ही था – जैसे भी हो, पार्क तक पहुँच कर झंडा फहराना।
यहीं उनकी सूझबूझ भी सामने आती है। पहरे के बीच से निकल कर वे एक पेड़ पर चढ़ गए, और फिर वहीं से तिरंगा लहरा दिया। एक किसान का बेटा, अंग्रेजी हुकूमत के सामने खुले आसमान तले भारत का झंडा फहरा रहा था।
तिरंगा फहरते ही चल गईं गोलियाँ
झंडा लहराते ही अंग्रेज सैनिकों की नजर गुलाब सिंह लोधी पर पड़ गई। हुक्म मिला- गोली चलाओ। कई बंदूकों से एक साथ फायरिंग हुई, गोलियाँ उनके बदन में धँस गईं, जिससे वे गंभीर हालत में पेड़ से नीचे गिर पड़े और 23 अगस्त 1935 को उन्होंने आखिरी साँस ली।
32 साल की उम्र में जब एक आम आदमी अपने परिवार और भविष्य के सपने बुनता है, उस उम्र में गुलाब सिंह लोधी ने देश की आजादी को अपनी जिंदगी से ऊपर रख दिया।
जिस पार्क में उन्होंने अंग्रेजी गोलियों के सामने झंडा फहराया, अमीनाबाद का वही पार्क आगे चलकर ‘झंडेवाला पार्क‘ के नाम से मशहूर हो गया और आजादी की लड़ाई का एक अहम ठिकाना बन गया।

गुलाब सिंह लोधी का बलिदान खास क्यों?
भारत की आजादी की लड़ाई सिर्फ दिल्ली-मुंबई-कोलकाता के बड़े नेताओं की कहानी नहीं है। इसकी असली जान थी वो लाखों-करोड़ों गुमनाम भारतीय, जिन्होंने अंग्रेजों के सामने खड़े होने की हिम्मत जुटाई। गुलाब सिंह लोधी इसी जनसैलाब का चेहरा हैं।
न कोई बड़ा राजनीतिक खानदान, न सत्ता, न फौजी ताकत, न हथियार। उनके पास बस एक झंडा था, आजादी का सपना था, और अंग्रेजों के आगे न झुकने का जज्बा। उनकी कहानी बताती है कि आजादी की लड़ाई में किसान समाज और गाँव का कितना बड़ा हाथ था। उन्नाव के एक गाँव से चलकर लखनऊ के अमीनाबाद पार्क तक पहुँचना, और वहाँ तिरंगा फहरा देना, ये अपने आप में उस दौर के ग्रामीण भारत की राजनीतिक चेतना की मिसाल है।
इतिहास में कम जगह, पर लोगों के दिलों में जिंदा
इतनी बड़ी घटना के बावजूद गुलाब सिंह लोधी का नाम राष्ट्रीय स्तर पर वो पहचान नहीं बना पाया, जो कई और सेनानियों को मिली।
फिर भी उन्नाव और लखनऊ में उनकी यादें आज भी जिंदा हैं। फतेहपुर चौरासी में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और पुलिस प्रशिक्षण केंद्र उनके नाम पर हैं। उनके पैतृक गाँव चंद्रिकाखेड़ा में उनकी प्रतिमा लगी है।
सीएम योगी ने लोधी के गाँव में प्रतिमा का किया अनावरण
13 मार्च 2024 को सीएम योगी आदित्यनाथ खुद चंद्रिकाखेड़ा पहुँचे थे और गुलाब सिंह लोधी की प्रतिमा का अनावरण किया था। उस मौके पर उन्होंने याद दिलाया था कि कैसे 1935 में उन्नाव से लखनऊ जाकर इस किसान बेटे ने तिरंगा फहराया और देश के लिए बलिदान दिया।
यानी जो कहानी कभी सिर्फ एक गाँव की याद बनकर रह सकती थी, उसे स्मारकों और सरकारी कार्यक्रमों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुँचाने की कोशिश हुई।
गुलाब सिंह लोधी जी की स्मृतियों को जीवंत बनाए रखने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने जनपद उन्नाव में पार्क, स्वास्थ्य केंद्र एवं पुलिस प्रशिक्षण केंद्र का नामकरण महान बलिदानी के नाम पर कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।
—मुख्यमंत्री @myogiadityanath जी pic.twitter.com/MDVvgfhEZA
— CM Office, GoUP (@CMOfficeUP) August 23, 2026
आज भी तिरंगे में बसी है उनकी कहानी
गुलाब सिंह लोधी की शहादत की सबसे गहरी तस्वीर यही है कि एक साधारण गाँव का लड़का, अंग्रेजी बंदूकों के सामने पेड़ पर चढ़कर तिरंगा फहरा रहा है। ये सिर्फ 1935 की एक घटना नहीं रह गई। ये इस बात की गवाही बन गई कि उस दौर में तिरंगा कोई साधारण कपड़ा नहीं, बल्कि गुलामी के खिलाफ भारतीय स्वाभिमान का ऐलान था।
आज जब देश आजादी के इतने दशकों बाद आगे बढ़ रहा है, तो गुलाब सिंह लोधी जैसे सेनानियों को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि आजादी हमें यूँ ही नहीं मिल गई थी, इसके पीछे बलिदानों की एक लंबी, दर्दनाक फेहरिस्त है।
23 अगस्त का दिन गुलाब सिंह लोधी की सिर्फ बरसी नहीं, बल्कि उस जज्बे की याद है जिसके आगे अंग्रेजों की बंदूकें भी छोटी पड़ गई थीं। अमीनाबाद में लहराया गया वो तिरंगा भले ही 1935 की बात हो, लेकिन उसकी गूँज आज भी सुनी जा सकती है।
यही वजह रही कि सीएम योगी आदित्यनाथ आज उनके बलिदान दिवस पर उनकी प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाने पहुँचे। गुलाब सिंह लोधी का नाम उस पीढ़ी के साथ हमेशा दर्ज रहेगा, जिसने तिरंगे को झुकने नहीं दिया और इसके लिए अपनी जान तक दे दी।
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