पुत्र वधू से – प्रतिभा सक्सेना

द्वार खड़ा हरसिंगार फूल बरसाता है
तुम्हारे स्वागत में,
पधारो प्रिय पुत्र- वधू।

ममता की भेंट लिए खड़ी हूँ कब से,
सुनने को तुम्हारे मृदु पगों की रुनझुन!
सुहाग रचे चरण तुम्हारे, ओ कुल-लक्ष्मी,
आएँगे चह देहरी पार कर सदा निवास करने यहाँ,
श्री-सुख-समृद्धि बिखेरते हुए।

अब तक जो मैं थी, तुम हो,
जो कुछ मेरा है तुम्हें अर्पित!
ग्रहण करो आँचल पसार कर, प्रिय वधू,
समय के झंझावातों से बचा लाई हूं जो,
अपने आँचल की ओट दे,
सौंपती हूँ तुम्हें–
उजाले की परंपरा!
ले जाना है तुम्हें
और उज्ज्वल, और प्रखर, और ज्योतिर्मय बना कर
कि बाट जोहती हैं अगली पीढियाँ।

मेरी प्रिय वधू, आओ
तुम्हारे सिन्दूर की छाया से
अपना यह संसार और अनुरागमय हो उठे।

∼ प्रतिभा सक्सेना

About Pratibha Saxena

जन्म: स्थान मध्य प्रदेश, भारत, शिक्षा: एम.ए, पी एच.डी., उत्तर कथा पुस्तकें: 1 सीमा के बंधन - कहानी संग्रह, 2. घर मेरा है - लघु-उपन्यास संग्रह .3. उत्तर कथा - खण्ड-काव्य. संपादन प्रारंभ से ही काव्यलेखन में रुचि, कवितायें, लघु-उपन्यास, लेख, वार्ता एवं रेडियो तथा रंगमंच के लिये नाटक रूपक, गीति-नाट्य आदि रचनाओं का साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन (विशाल भारत ,वीणा, ज्ञानोदय, कादंबिनी, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, अमेरिका से प्रकाशित, विश्व विवेक, हिन्दी जगत्‌ आदि में।) सम्प्रति : आचार्य नरेन्द्रदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कानपुर में शिक्षण. सन्‌ 1998 में रिटायर होकर, अधिकतर यू.एस.ए. में निवास. pratibha_saksena@yahoo.com

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