व्यक्तित्व का मध्यांतर – गिरिजा कुमार माथुर

लो आ पहुँचा सूरज के चक्रों का उतार
रह गई अधूरी धूप उम्र के आँगन में
हो गया चढ़ावा मंद वर्ण–अंगार थके
कुछ फूल रह गए शेष समय के दामन में।

खंडित लक्ष्यों के बेकल साये ठहर गए
थक गये पराजित यत्नों के अन–रुके चरण
मध्याह्न बिना आये पियराने लगी धूप
कुम्हलाने लगा उमर का सूरजमुखी बदन।

वह बाँझ अग्नि जो रोम–रोम में दीपित थी
व्यक्तित्व देह को जला स्वयं ही राख हुई
साहस गुमान की दोज उगी थी जो पहले
वह पीत चंद्रमा वाला अन्धा पाख हुई।

रंगीन डोरियाँ ऊध्र्व कामनाओं वाली
थे खींचे जिनसे नय–नये आकाश दिये
हर चढ़े बरस ने तूफानी उँगलियाँ बढ़ा
अधजले दीप वे एक–एक कर बुझा दिये।

तन की छाया सी साथ रही है अडिग रात
पथ पर अपने ही चलते पाँव चमकते हैं
रह जाती ज्यों सोने की रेत कसौटी पर
सोने के बदले सिर्फ निशान झलकते हैं।

आ रहीं अँँधिकाएँ भरने को श्याम रंग
हर उजले रंग का चमक चँदोवा मिटता है
नक्षत्र भावनाओं के बुझते जाते हैं
हर चाँद कामना का सियाह हो उगता है।

हर काम अधूरे रहे वर्ष रस के बीते
वय के वसंत की सूख रही आख़िरी कली
तूफ़ान भँवर में पड़ कर भी मोती न मिले
हर मोती में सूनी वन्धया चीत्कार मिली।

चल रहा उमर का रथ दिनान्त के पहियों पर
मंज़िलें खोखली पथ ऊसर एकाकी है
गति व्यर्थ गई उपलब्धिहीन साधना रही
मन में लेकिन संध्या की लाली बाकी है।

इस लाली का मैं तिलक करूँ हर माथे पर
दूँ उन सब को जो पीड़ित हैं मेरे समान
दुख‚ दर्द‚ अभाव भोगकर भी जो झुके नहीं
जो अन्यायों से रहे जूझते वक्ष तान।

जो सज़ा भोगते रहे सदा सच कहने की
जो प्रभुता‚ पद‚ आतंकों से नत हुए नहीं
जो विफल रहे पर कृपा ना माँगी घिघियाकर
जो किसी मूल्य पर भी शरणागत हुए नहीं।

∼ गिरिजा कुमार माथुर

About Girija Kumar Mathur

गिरिजा कुमार माथुर (22 अगस्त 1919 - 10 जनवरी 1995) का जन्म ग्वालियर जिले के अशोक नगर कस्बे में हुआ। वे एक कवि, नाटककार और समालोचक के रूप में जाने जाते हैं। उनके पिता देवीचरण माथुर स्कूल अध्यापक थे तथा साहित्य एवं संगीत के शौकीन थे। वे कविता भी लिखा करते थे। सितार बजाने में प्रवीण थे। माता लक्ष्मीदेवी मालवा की रहने वाली थीं और शिक्षित थीं। गिरिजाकुमार की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। उनके पिता ने घर ही अंग्रेजी, इतिहास, भूगोल आदि पढाया। स्थानीय कॉलेज से इण्टरमीडिएट करने के बाद 1936 में स्नातक उपाधि के लिए ग्वालियरचले गये। 1938 में उन्होंने बी.ए. किया, 1941 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में एम.ए. किया तथा वकालत की परीक्षा भी पास की। सन 1940 में उनका विवाह दिल्ली में कवयित्री शकुन्त माथुर से हुआ। गिरिजाकुमार की काव्यात्मक शुरुआत 1934 में ब्रजभाषा के परम्परागत कवित्त-सवैया लेखन से हुई। वे विद्रोही काव्य परम्परा के रचनाकार माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन आदि की रचनाओं से अत्यधिक प्रभावित हुए और 1941 में प्रकाशित अपने प्रथम काव्य संग्रह 'मंजीर' की भूमिका उन्होंने निराला से लिखवायी। उनकी रचना का प्रारम्भ द्वितीय विश्वयुद्ध की घटनाओं से उत्पन्न प्रतिक्रियाओं से युक्त है तथा भारत में चल रहे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन से प्रभावित है। सन 1943 में अज्ञेय द्वारा सम्पादित एवं प्रकाशित 'तारसप्तक' के सात कवियों में से एक कवि गिरिजाकुमार भी हैं। यहाँ उनकी रचनाओं में प्रयोगशीलता देखी जा सकती है। कविता के अतिरिक्त वे एकांकी नाटक, आलोचना, गीति-काव्य तथा शास्त्रीय विषयों पर भी लिखते रहे हैं। उनके द्वारा रचित मंदार, मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले आदि काव्य-संग्रह तथा खंड काव्य पृथ्वीकल्प प्रकाशित हुए हैं। भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की साहित्यिक पत्रिका 'गगनांचल' का संपादन करने के अलावा उन्होंने कहानी, नाटक तथा आलोचनाएँ भी लिखी हैं। उनका ही लिखा एक भावान्तर गीत "हम होंगे कामयाब" समूह गान के रूप में अत्यंत लोकप्रिय है। 1991 में आपको कविता-संग्रह "मै वक्त के सामने" के लिए हिंदी का साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 1993 में के. के. बिरला फ़ाउंडेशन द्वारा दिया जाने वाला प्रतिष्ठित व्यास सम्मान प्रदान किया गया। उन्हें शलाका सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है। गिरिजाकुमार माथुर की समग्र काव्य-यात्रा से परिचित होने के लिए उनकी पुस्तक "मुझे और अभी कहना है" अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

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