एक तिनका – अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ
एक दिन जब था मुँडेरे पर खड़ा
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।

मैं झिझक उठा हुआ बैचैन सा
लाल होकर आँख भी दुखने लगी
मूठ देने लोग कपड़े की लगे
ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी।

जब किसी ढब से निकल तिनका गया
तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिये
ऐंठता तू किस लिये इतना रहा
एक तिनका है बहुत तेरे लिये।

∼ अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

About Ayodhya Singh Upadhyay ‘Hariaudh’

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (१५ अप्रैल, १८६५ – १६ मार्च, १९४७) हिन्दी के एक सुप्रसिद्ध साहित्यकार है। यह हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति रह चुके हैं और सम्मेलन द्वारा विद्यावाचस्पति की उपाधि से सम्मानित किये जा चुके हैं। प्रिय प्रवास हरिऔध जी का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह हिंदी खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है और इसे मंगलाप्रसाद पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।

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