अरसे के बाद - राजीव कृष्ण सक्सेना

अरसे के बाद – राजीव कृष्ण सक्सेना

अरसे के बाद गगन घनदल से युक्त हुआ
अरसे के बाद पवन फिर से उन्मुक्त हुआ
अरसे के बाद घटा जम कर‚ खुल कर बरसी
सोंधा–सोंधा सा मन धरती का तृप्त हुआ

दूर हुए नभ पर लहराते कलुषित साए
भूली मुस्कानों ने फिर से पर फैलाए
बरसों से बन बन भटके विस्मृत पाहुन से
बीते दिन लौट आज वापस घर तक आए

कूक गया कानो में‚ चिरपरिचित अपनापन
झूल गया बाहों में इठलाता आलिंगन
पिघला पथराया मन‚ स्पर्शों की ऊष्मा से
दूर हुई पल भर में बरसों की जमी थकन

दोहराई प्रियतम ने परिणय की परिभाषा
जाग उठी तन–मन में सुप्त हुई अभिलाषा
परतों से जमे गिले नैनों से बह निकले
गीतों ने लूट लिया बरसों का सन्नाटा

प्रियतम के हाथों को हाथों में लिपटा कर
उल्लासित हृदय लिये जी भर कर रोई मैं
मस्त मगन मन के नवनिर्मित मृदु सपनों के
रंगों मे घुल मिल कर देर तलक सोई मैं

∼ राजीव कृष्ण सक्सेना

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