धुंधले सपने – गगन गुप्ता ‘स्नेह’

मेरे कैनवास पर कुछ धुंधले से चित्र उकर आए हैं
यादों में बसे कुछ अनछुए से साए हैं
तूलिका, एक प्लेट में कुछ रंग
लाल, पीला, नीला, सफेद…
मेरे सामने पड़े हैं और ये कह हैं रहे
भर दो इन्हें चित्रों में और खोल लो आज दिल की तहें।

अगर मैं लाल रंग उठाता हूं
तो बरबस मां का ध्यान आता है
ध्यान आता है और मुझे यादों के झरोखों में ले जाता है
मां जिसने मुझे हंसना सिखाया
हंसना सिखाया, रोकर हंसना सिखाया
परिवार की खुशियों के लिए थी वो सारे दिन जलती
उसकी सारी उम्मीदें मुझसे थी पलती।

अगर मैं सफेद रंग उठाता हूं
तो बरबस अपने से जुड़े पिता के सपनों को पाता हूं
सपने जिन्हें कर न सका पूरे
सपने जो रह गए अधूरे
उनके थके मन को कुछ छांह दे सकूं
दुःखी मन की मैं थाह ले सकूं
पता नहीं ये सब कर पाऊंगा या नहीं
पता नहीं उनके लिए कुछ कर पाऊंगा नहीं।

जब हरे रंग की हरियाली सामने आती है
बस चारों ओर मेरी बहन मुझे नजर आती है
छोटी, पागल, नाचती, कूदती, इठलाती
टूटे खिलौने, कागज की नाव पर इतराती
दुनिया की सच्चाई का अभी उसे भान नहीं
मैं मझधारें राह में कितनी, इसका उसे ज्ञान नहीं।

वैसे तो इन सारे चित्रों के अलावा और भी बहुत से चित्र हैं
हैं अपने ख्यालात ऐसे कि बन गए बहुत से मित्र हैं
पर इनमें एक चित्र अनूठा सा है
यादों के कोहरे में हो गया ठूंठा सा है
जो रंग भर दो वही फब जाए उस पर
रंग बनाए ही खुदा ने फिदा हो कर उस पर।

वैसे नीला रंग था आंखों का बड़ा ही प्यारा
पीले रंग में दमक उठता था तन उसका सारा
गुलाबी वस्त्रों में वो चहक उठती थी
धानी रंग की बेले भी मुस्कुरा उठतीं थी
जिंदगी के सपने मुझे दिखा कर वो न जाने कहां खो गई।

वैसे मेरी जिन्दगी ही फंसती ही जा रही है मुश्किलों में कई
ये तूलिका, ये कैनवास, ये रंग और ये धुंधले से चित्र
लो छिड़क लिया आज मैंने अपनी यादों का इत्र।

∼ गगन गुप्ता ‘स्नेह’

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