एक राज्य में बहुत ही सुंदर तथा आकर्षक मूर्तियां बनाने वाला एक मूर्तिकार रहता था। उसके द्वारा बनाई गई मूर्तियों की विशेषता यह थी कि उन्हें देखकर ऐसा लगता था कि मूर्ति अभी बोल उठेगी।
उसके द्वारा बनाई गई मूर्तियों की चर्चा देश-विदेश में भी होती थी। उसकी बनाई मूर्तियों को खरीदने वाले लोग दूर-दूर से आते थे और मूर्तिकार को मूर्ति का मूल्य देने के साथ-साथ उसकी कारीगरी के लिए ईनाम भी देते थे।
बुद्धिमान मूर्तिकार: प्रिंसिपल विजय कुमार
एक बार राज्य के राजा ने उस मूर्तिकार को अपने दरबार में बुलाकर कहा, “श्रीमान, मेरे राजमहल के लिए एक ऐसी मूर्ति बनाकर दो, जो आज तक आपने पहले कभी न बनाई हो और ऐसी मूर्ति पहले किसी ने कभी न देखी हो। यदि तुम्हारे द्वारा बनाई हुई मूर्ति मुझे और रानी को पसंद आ गई, तो तुम्हें सोने के सिक्के देने के साथ-साथ राज्य का राजकीय मूर्तिकार भी घोषित किया जाएगा।”
मूर्तिकार ने कहा, “महाराज, मैं अपनी ओर से ऐसी मूर्ति बनाऊंगा, जिसे देखकर आप और राजमहल में आने वाले शाही अतिथि अवश्य प्रसन्न करेंगे। आप मुझे अपनी कला का प्रदर्शन करने का अवसर प्रदान कर रहे हैं, मैं आपको निराश नहीं होने दूंगा।”
मूर्तिकार ने कुछ महीने लगाकर एक बहुत ही सुंदर मूर्ति तैयार की और उसे राजा के दरबार में पेश किया। राजा और रानी को मूर्ति बहुत पसंद आई। राजा ने अपने मंत्रियों और दरबारियों से मूर्ति के संबंध में अपने विचार बताने को कहा।
कुछ दरबारियों के मन में मूर्तिकार के प्रति राजा की प्रियता तथा मिलने वाले ईनाम से ईर्ष्या उत्पन्न हो गई। उन्होंने मूर्ति में कई नुक्स निकाल दिए।
मूर्तिकार उन दरबारियों की बातें सुनकर न तो घबराया और न ही क्रोधित हुआ। उसने बड़ेशांत स्वभाव से कहा, “महाराज, आपके दरबारी कला की बारीकियों को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। यह मूर्ति आपके राजमहल में रखी जानी है। बड़े-बड़े शाही अतिथि इस मूर्ति को देखेंगे। बहुत अच्छा हुआ कि इन लोगों ने इस मूर्ति के नुक्स बताकर मुझे इसे और सुंदर बनाने का अवसर प्रदान किया है।”
मूर्तिकार मूर्ति को उठाकर अपने घर ले गया। कुछ दिन बाद उसने वह मूर्ति राजा के दरबार में पुनः पेश करते हुए राजा से कहा, “राजन, आपके दरबारियों के आदेश के अनुसार मैंने मूर्ति के सभी नुक्स दूर कर दिए हैं। अब आप सभी मूर्ति को ध्यान से देख लें। यदि फिर भी किसी को कोई नुक्स लगता है, तो मैं उसे भी दूर कर देता हूं।”
राजा के बिना कुछ बोले ही सभी दरबारियों ने मूर्ति को बहुत सुंदर बता दिया। राजा ने मूर्तिकार से कहा, “श्रीमान, मुझे तो ऐसा लग रहा है कि तुमने मूर्ति में कोई बदलाव किया ही नहीं।”
मूर्तिकार राजा की बात सुनकर बोला, “महाराज, आपने बिल्कुल ठीक पहचाना। मूर्ति में कोई नुक्स था ही नहीं, फिर मैं मूर्ति में बदलाव क्या करता? यदि मैं उस समय दरबारियों के आदेश को नकारता, तो उनके आदेश का उल्लंघन होता और वे मेरी बात का बुरा मान जाते। अब अपना आदेश सुनाएं।”
राजा मूर्तिकार की दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता को देखकर बहुत हैरान हुआ। दरबारियों के पास भी चुप रहने के अलावा और कोई चारा नहीं था। राजा ने मूर्तिकार को पुरस्कार देते हुए कहा, “आज से तुम मेरे दरबार में बैठोगे।”
सीख:
बुद्धिमानी केवल अपनी कला में निपुण होने का नाम नहीं है, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और समझदारी से काम लेना भी सच्ची बुद्धिमानी है।
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