Yearly Archives: 2015

मन पाखी टेरा रे – वीरबाला भावसार

रुक रुक चले बयार, कि झुक झुक जाए बादल छाँह कोई मन सावन घेरा रे, कोई मन सावन घेरा रे ये बगुलों की पांत उडी मन के गोले आकाश कोई मन पाखी टेरा रे कोई मन पाखी टेरा रे कौंध कौंध कर चली बिजुरिया, बदल को समझने बीच डगर मत छेड़ लगी है, पूर्व हाय लजाने सहमे सकुचे पांव, कि …

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मन ऐसा अकुलाया – वीरबाला भावसार

एक चिरैया बोले, हौले आँगन डोले मन ऐसा अकुलाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया। चन्दन धुप लिपा दरवाज़ा, चौक पूरी अँगनाई बड़े सवेरे कोयल कुहुकी, गूंज उठी शहनाई भोर किरण क्या फूटी, मेरी निंदिया टूटी मन ऐसा अकुलाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया। झर झर पात जहर रहे मन के, एकदम सूना सूना कह तो देती मन ही पर, दुःख …

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Truth Quotes in Hindi

Truth Quotes in Hindi

सत्य, सच, सत्यार्थ से मिलते जुलते शब्दों से बने कुछ प्रसिद्ध विचार आपके विचार आपके जीवन का निर्माण करते हैं.  यहाँ संग्रह किये गए महान विचारकों के हज़ारों कथन आपके जीवन में एक सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं.

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वो सुबह कभी तो आएगी – साहिर लुधियानवी

वो सुबह कभी तो आएगी। इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा जब अंबर झूम के नाचेगा जब धरती नगमे गाएगी वो सुबह कभी तो आएगी। जिस सुबह की खातिर युग युग से, हम सब मर मर कर जीते हैं जिस सुबह की अनृत की धुन …

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कभी कभी – साहिर लुधियानवी

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि जिंदगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाओं में गुज़रने पाती तो शादाब भी हो सकती थी ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है तेरी नज़र की शुआओ में खो भी सकती थी अजब न था कि मैं बेगाना–ऐ–आलम रहकर तेरे जमाल की रानाइयों में खो रहता तेरा गुदाज़ बदन‚ तेरी नीम–बाज़ …

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खून फिर खून है – साहिर लुधियानवी

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढ़ता है तो मिट जाता है खून फिर खून है टपकेगा तो जम जाएगा तुमने जिस खून को मक्तल में दबाना चाहा आज वह कूचा–ओ–बाज़ार में आ निकला है कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर खून चलता है तो रुकता नहीं संगीनों से सर उठाता है तो दबता नहीं आईनों से जिस्म की मौत कोई …

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उठो लाल अब आँखें खोलो – शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

उठो लाल अब आंखें खोलो अपनी बदहालत पर रोलो पानी तो उपलब्ध नहीं है चलो आंसुओं से मुँह धोलो॥ कुम्हलाये पौधे बिन फूले सबके तन सिकुड़े मुंह फूले बिजली बिन सब काम ठप्प है बैठे होकर लँगड़े लूले बेटा उठो और जल्दी से नदिया से कुछ पानी ढ़ोलो॥ बीते बरस पचास प्रगति का सूरज अभी नहीं उग पाया जिसकी लाठी …

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फूल और मिट्टी – वीरबाला भावसार

मिट्टी को देख फूल हँस पड़ा मस्ती से लहरा कर पंखुरियाँ बोला वह मिट्टी से– उफ मिट्टी! पैरों के नीचे प्रतिक्षण रौंदी जा कर भी कैसे होता है संतोष तुम्हें? उफ मिट्टी! मैं तो यह सोच भी नहीं सकता हूं क्षणभर‚ स्वर में कुछ और अधिक बेचैनी बढ़ आई‚ ऊंचा उठ कर कुछ मृदु–पवन झकोरों में उत्तेजित स्वर में‚ वह …

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नींद की पुकार – वीरबाला भावसार

नींद बड़ी गहरी थी, झटके से टूट गई तुमने पुकारा, या द्वार आकर लौट गए। बार बार आई मैं, द्वार तक न पाया कुछ बार बार सोई पर, स्वप्न भी न आया कुछ अनसूया अनजागा, हर क्षण तुमको सौंपा तुमने स्वीकारा, या द्वार आकर लौट गए। चुप भी मैं रह न सकी, कुछ भी मैं कह न सकी जीवन की …

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है मन का तीर्थ बहुत गहरा – वीरबाला भावसार

है मन का तीर्थ बहुत गहरा। हंसना‚ गाना‚ होना उदास‚ ये मापक हैं न कभी मन की गहराई के। इनके नीचे‚ नीचे‚ नीचे‚ है कुछ ऐसा‚ जो हरदम भटका करता है। हंसते हंसते‚ बातें करते‚ एक बहुत उदास थकी सी जो निश्वास‚ निकल ही जाती है‚ मन की भोली गौरैया को जो कसे हुए है भारी भयावना अजगर‚ ये सांस …

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