मन ऐसा अकुलाया – वीरबाला भावसार

एक चिरैया बोले, हौले आँगन डोले
मन ऐसा अकुलाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

चन्दन धुप लिपा दरवाज़ा, चौक पूरी अँगनाई
बड़े सवेरे कोयल कुहुकी, गूंज उठी शहनाई
भोर किरण क्या फूटी, मेरी निंदिया टूटी
मन ऐसा अकुलाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

झर झर पात जहर रहे मन के, एकदम सूना सूना
कह तो देती मन ही पर, दुःख हो जाता है दूना
एक नज़र क्या अटकी, जाने कब तक भटकी
मन ऐसा घबराया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

सांझ घिरी बदली पावस की, कुछ उजली कुछ काली
टप टप बूँद गिरे आँचल में, रात मोतियों वाली
कैसा घिरा अँधेरा, सब घर आँगन घेरा
मन ऐसा भटकाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

तन सागर तट बैठा, मन का पंथी विरह गाये
गूंजे कोई गीत की मुझको, एक लहर छु जाये
मेरा तन मन पार्स जीवन मधुर बरसे
मन ऐसा भर आया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

यह जाड़ो की धुप हिरनिया, खेतों खेतों डोले
यह उजलाई हंसी चाँद की, नैनो नैनों डोले
यह संदेश हरकारा, अब तक रहा कुंवारा
तुमको नही पठाया, रहा रह ध्यान तुम्हारा आया।

चंदा की बारात सजी है, तारों की दीवाली
एक बहुरिया नभ से उतरी, सोने रूपए वाली
कैसा जाड़ो फेरा, मन भी हुआ अनेरा
पर न कहीं कुछ पाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

फूली है फुलवारी जैसे, महके केसर प्यारी
यह बयार दक्खिन से आई, ले अँखियाँ मतवारी
यह फूलो का डोला, उस पर यह अनबोला
रास न मुझको आया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया।

∼ डॉ. वीरबाला भावसार

About Veerbala Bhavsar

डॉ. वीरबाला भावसार (अक्टूबर 1931 – अगस्त 2010) स्वतंत्र्ता से पूर्व जन्मे रचनाकारों की उस पीढी से है, जिन्होंने प्रयोगवाद व प्रगतिवाद के दौर में अपनी रचना-यात्र प्रारम्भ की तथा आधुनिक मुक्त छंद की कविता तक विभिन्न सोपान से गुजरते हुए कविता कामिनी के सुकुमार स्वरूप को बनाए रखा। छायावादियों की तरह का एक रूमानी संसार कविता म बसाए रखना, इस प्रकार के रचनाकारों की विशिष्टता है। इस दौर में हिन्दी साहित्य में कई बडे रचनाकारों ने गद्य गीतों की रचना की। डॉ. वीरबाला भावसार द्वारा रचित इस संकलन की कुछ कविताओं यथा ‘भोर हुई है’, ‘मैं निद्रा में थी’, ‘वैरागिनी’, ‘तुलिका हूँ’ तथा ‘बाती जलती है’ आदि को गद्य गीत या गद्य काव्य की श्रेणी में रखा जा सकता है।

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