मन पाखी टेरा रे – वीरबाला भावसार

रुक रुक चले बयार, कि झुक झुक जाए बादल छाँह
कोई मन सावन घेरा रे, कोई मन सावन घेरा रे
ये बगुलों की पांत उडी मन के गोले आकाश
कोई मन पाखी टेरा रे
कोई मन पाखी टेरा रे

कौंध कौंध कर चली बिजुरिया, बदल को समझने
बीच डगर मत छेड़ लगी है, पूर्व हाय लजाने
सहमे सकुचे पांव, कि नयनों पर पलकों की छाँव
किसने मुद कर हेरा रे
कोई मन पाखी टेरा रे

झूम झूम झुक जाए चंपा, फूल फूल उतराये
गदराई केलों की कलियाँ, सावन शोर मचाये
रिम झिम बरसे प्यार की पल पल उमगे मेघ मल्हार
मधुर रास सारा तेरा रे
कोई मन पाखी टेरा रे

पात पात लहराए बगिया, उमग उमग बौराये
सौंधी सौंधी गंध धरा की, कन कन महकी जाये
बहकी बहकी सांस, कि अँखियों भर भर दिये उजास
मन कहाँ बसेरा रे
कोई मन पाखी टेरा रे

रूठ रूठ खुल जाये पयलिया, छुम छुम चली मनाने
सूने सूने पांव महावर, दुल्हिन चली रचाने
किसके मन की बात, की सकुचे किसका कोमल गात
कहाँ पर हुआ सवेरा रे
कोई मन पाखी टेरा रे
कोई मन पाखी टेरा रे

∼ डॉ. वीरबाला भावसार

About Veerbala Bhavsar

डॉ. वीरबाला भावसार (अक्टूबर 1931 – अगस्त 2010) स्वतंत्र्ता से पूर्व जन्मे रचनाकारों की उस पीढी से है, जिन्होंने प्रयोगवाद व प्रगतिवाद के दौर में अपनी रचना-यात्र प्रारम्भ की तथा आधुनिक मुक्त छंद की कविता तक विभिन्न सोपान से गुजरते हुए कविता कामिनी के सुकुमार स्वरूप को बनाए रखा। छायावादियों की तरह का एक रूमानी संसार कविता म बसाए रखना, इस प्रकार के रचनाकारों की विशिष्टता है। इस दौर में हिन्दी साहित्य में कई बडे रचनाकारों ने गद्य गीतों की रचना की। डॉ. वीरबाला भावसार द्वारा रचित इस संकलन की कुछ कविताओं यथा ‘भोर हुई है’, ‘मैं निद्रा में थी’, ‘वैरागिनी’, ‘तुलिका हूँ’ तथा ‘बाती जलती है’ आदि को गद्य गीत या गद्य काव्य की श्रेणी में रखा जा सकता है।

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