इतनी शक्ति हमें देना दाता मन् का वीश्वास कमजोर हो ना हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूलकर भी कोई भूल हो ना… हर तरफ ज़ुल्म है बेबसी है सहमा सहमा सा हर आदमी है पाप का बोझ बढ़ता ही जाये जाने कैसे ये धरती थमी है बोझ ममता का तू ये उठा ले तेरी रचना का ये अंत हो …
Read More »Yearly Archives: 2015
हिंदी दोहे गणतंत्र के – डॉ. शरद नारायण खरे
भारत के गणतंत्र का, सारे जग में मान। छह दशकों से खिल रही, उसकी अद्भुत शान॥ सब धर्मों को मान दे, रचा गया इतिहास। इसीलिए हर नागरिक, के अधरों पर हास॥ प्रजातंत्र का तंत्र यह, लिये सफलता-रंग। जात-वर्ग औ क्षेत्र का, भेद नहीं है संग॥ पांच वर्ष में हो रहा, संविधान का यज्ञ। शांतिपूर्ण ढंग देखकर, चौंके सभी सुविज्ञ॥ भारत …
Read More »हिन्दुस्तान के लिए – मनोहर लाल ‘रत्नम’
कहीं हिन्दू सिख मुसलमान के लिए, कहीं छोटी और कहीं कृपाण के लिए। दंगो से तो देखा मेरा देश जल रहा- भैया कुछ तो सोचो हिन्दुस्तान के लिए॥ चिराग घर के के ही जल रह यहाँ, मदारी अपनी ढपलियां बजा रहे यहाँ। द्वेष वाली भावना के विष को घोलके- देश कि अखंडता वो खा रहे यहाँ॥ भाषा-भाषी झगडे जुबान के …
Read More »Kabah Quiz
The Kabah or Ka’aba, is a cuboid building at the center of Islam’s most sacred mosque in Mecca, Saudi Arabia. It is the most sacred site in Islam. Complete the Kabah quiz – it has 6 questions related to Kabah.
Read More »हल्दीघाटी: अष्टादश सर्ग – श्याम नारायण पाण्डेय
अष्टादश सर्ग : मेवाड़ सिंहासन यह एकलिंग का आसन है, इस पर न किसी का शासन है। नित सिहक रहा कमलासन है, यह सिंहासन सिंहासन है ॥१॥ यह सम्मानित अधिराजों से, अर्चत है, राज–समाजों से। इसके पद–रज पोंछे जाते भूपों के सिर के ताजों से ॥२॥ इसकी रक्षा के लिए हुई कुबार्नी पर कुबार्नी है। राणा! तू इसकी रक्षा कर …
Read More »हल्दीघाटी: सप्तदश सर्ग – श्याम नारायण पाण्डेय
सप्तदश सर्ग: सगफागुन था शीत भगाने को माधव की उधर तयारी थी। वैरी निकालने को निकली राणा की इधर सवारी थी ॥१॥ थे उधर लाल वन के पलास, थी लाल अबीर गुलाल लाल। थे इधर क्रोध से संगर के सैनिक के आनन लाल–लाल ॥२॥ उस ओर काटने चले खेत कर में किसान हथियार लिये। अरि–कण्ठ काटने चले वीर इस ओर …
Read More »हल्दीघाटी: षोडश सर्ग – श्याम नारायण पाण्डेय
षोडश सर्ग: सगथी आधी रात अंधेरी तम की घनता थी छाई। कमलों की आंखों से भी कुछ देता था न दिखाई ॥१॥ पर्वत पर, घोर विजन में नीरवता का शासन था। गिरि अरावली सोया था सोया तमसावृत वन था ॥२॥ धीरे से तरू के पल्लव गिरते थे भू पर आकर। नीड़ों में खग सोये थे सन्ध्या को गान सुनाकर ॥३॥ …
Read More »हल्दीघाटी: चतुर्दश सर्ग – श्याम नारायण पाण्डेय
चतुर्दश सर्ग: सगरजनी भर तड़प–तड़पकर घन ने आंसू बरसाया। लेकर संताप सबेरे धीरे से दिनकर आया ॥१॥ था लाल बदन रोने से चिन्तन का भार लिये था। शव–चिता जलाने को वह कर में अंगार लिये था ॥२॥ निशि के भीगे मुरदों पर उतरी किरणों की माला। बस लगी जलाने उनको रवि की जलती कर–ज्वाला ॥३॥ लोहू जमने से लोहित सावन …
Read More »हल्दीघाटी: त्रयोदश सर्ग – श्याम नारायण पाण्डेय
त्रयोदश सर्ग: सगजो कुछ बचे सिपाही शेष, हट जाने का दे आदेश। अपने भी हट गया नरेश, वह मेवाड़–गगन–राकेश ॥१॥ बनकर महाकाल का काल, जूझ पड़ा अरि से तत्काल। उसके हाथों में विकराल, मरते दम तक थी करवाल ॥२॥ उसपर तन–मन–धन बलिहार झाला धन्य, धन्य परिवार। राणा ने कह–कह शत–बार, कुल को दिया अमर अधिकार ॥३॥ हाय, ग्वालियर का सिरताज, …
Read More »हल्दीघाटी: द्वादश सर्ग – श्याम नारायण पाण्डेय
द्वादश सर्ग: सगनिबर् ल बकरों से बाघ लड़े, भिड़ गये सिंह मृग–छौनों से। घोड़े गिर पड़े गिरे हाथी, पैदल बिछ गये बिछौनों से ॥१॥ हाथी से हाथी जूझ पड़े, भिड़ गये सवार सवारों से। घोड़ों पर घोड़े टूट पड़े, तलवार लड़ी तलवारों से ॥२॥ हय–रूण्ड गिरे, गज–मुण्ड गिरे, कट–कट अवनी पर शुण्ड गिरे। लड़ते–लड़ते अरि झुण्ड गिरे, भू पर हय …
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