Yearly Archives: 2015

कोई पार नदी के गाता – हरिवंश राय बच्चन

भंग निशा की नीरवता कर इस देहाती गाने का स्वर ककड़ी के खेतों से उठकर, आता जमुना पर लहराता कोई पार नदी के गाता होंगे भाई-बंधु निकट ही कभी सोचते होंगे यह भी इस तट पर भी बैठा कोई, उसकी तानों से सुख पाता कोई पार नदी के गाता आज न जाने क्यों होता मन सुन कर यह एकाकी गायन …

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कौन यह तूफ़ान रोके – हरिवंश राय बच्चन

कौन यह तूफान रोके! हिल उठे जिनसे समुंदर‚ हिल उठे दिशि और अंबर हिल उठे जिससे धरा के! वन सघन कर शब्द हर–हर! उस बवंडर के झकोरे किस तरह इंसान रोके! कौन यह तूफान रोके! उठ गया‚ लो‚ पांव मेरा‚ छुट गया‚ लो‚ ठांव मेरा‚ अलविदा‚ ऐ साथ वालो और मेरा पंथ डेरा; तुम न चाहो‚ मैं न चाहूं‚ कौन …

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जो बीत गई सो बात गई – हरिवंश राय बच्चन

जीवन में एक सितारा था माना वह बेहद प्यारा था वह डूब गया तो डूब गया अम्बर के आनन को देखो कितने इसके तारे टूटे कितने इसके प्यारे छूटे जो छूट गए फिर कहाँ मिले पर बोलो टूटे तारों पर कब अम्बर शोक मनाता है जो बीत गई सो बात गई जीवन में वह था एक कुसुम थे उसपर नित्य …

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इस पार – उस पार – हरिवंश राय बच्चन

इस पार, प्रिये, मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का, लहरालहरा यह शाखा‌एँ कुछ शोक भुला देती मन का, कल मुर्झानेवाली कलियाँ हँसकर कहती हैं मगन रहो, बुलबुल तरु की फुनगी पर से संदेश सुनाती यौवन का तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती …

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यात्रा और यात्री – हरिवंश राय बच्चन

साँस चलती है तुझे चलना पड़ेगा ही मुसाफिर! चल रहा है तारकों का दल गगन में गीत गाता, चल रहा आकाश भी है शून्य में भ्रमता-भ्रमाता, पाँव के नीचे पड़ी अचला नहीं, यह चंचला है, एक कण भी, एक क्षण भी एक थल पर टिक न पाता, शक्तियाँ गति की तुझे सब ओर से घेरे हु‌ए है; स्थान से अपने …

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