Home » Poems For Kids » Poems In Hindi » शरद की हवा – गिरिधर गोपाल जी द्वारा शब्द चित्रण
शरद की हवा - गिरिधर गोपाल जी द्वारा शब्द चित्रण

शरद की हवा – गिरिधर गोपाल जी द्वारा शब्द चित्रण

शरद की हवा ये रंग लाती है,
द्वार–द्वार, कुंज–कुंज गाती है।

फूलों की गंध–गंध घाटी में
बहक–बहक उठता अल्हड़ हिया
हर लता हरेक गुल्म के पीछे
झलक–झलक उठता बिछुड़ा पिया

भोर हर बटोही के सीने पर
नागिन–सी लोट–लोट जाती है।

रह–रह टेरा करती वनखण्डी
दिन–भर धरती सिंगार करती है
घण्टों हंसिनियों के संग धूप
झीलों में जल–विहार करती है

दूर किसी टीले पर दिवा स्वप्न
अधलेटी दोपहर सजाती है।

चाँदनी दिवानी–सी फिरती है
लपटों से सींच–सींच देती है
हाथ थाम लेती चौराहों के
बाँहों में भींच–भींच लेती है

शिरा–शिरा तड़क–तड़क उठती है
जाने किस लिए गुदगुदाती है।

~ गिरिधर गोपाल

आपको गिरिधर गोपाल जी की यह कविता “शरद की हवा” कैसी लगी – आप से अनुरोध है की अपने विचार comments के जरिये प्रस्तुत करें। अगर आप को यह कविता अच्छी लगी है तो Share या Like अवश्य करें।

यदि आपके पास Hindi / English में कोई poem, article, story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें। हमारी Id है: submission@4to40.com. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ publish करेंगे। धन्यवाद!

Check Also

समझो प्रकृति का महत्व - विश्व पर्यावरण दिवस

समझो प्रकृति का महत्व – विश्व पर्यावरण दिवस

विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस संयुक्त्त राष्ट्र द्वारा प्रकृति को समर्पित दुनिया …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *