बाला की दिवाली: गरीबों की सूनी दिवाली की कहानी

बाला की दिवाली: गरीबों की सूनी दिवाली की कहानी

“माँ… पटाखे लेने है मुझे” बाला ने दिवार के कोने में बैठे हुए कहा।

“कहाँ से ले दूँ?” बाला की माँ, शांता का तुरंत जवाब आया।

“पर दिवाली में तो सब बच्चे पटाखे फोड़ते है” बाला ने एक और कोशिश करते हुए कहा।

“हाँ, पर उनके मम्मी पापा के पास पैसे होते है?” माँ ने रस्सी पर कपड़े डालते हुए कहा।

बाला कुछ और पूछती कि तभी माँ बोली – “आज मुझे वर्मा आंटी के घर दिवाली की सफ़ाई के लिए जाना है इसलिए तुम सामने वाले घर में बर्तन कर आना”।

बाला का दिल बैठ गया। उसे दूसरों के घरों में बर्तन माँजना बिलकुल नहीं अच्छा लगता था। वह जैसे ही कुछ कहने को हुई उसने माँ की तरफ़ देखा जो ज़मीन पर ही बैठकर अपना पैर दबा रही थी।

बाला कुछ नहीं बोली और चुपचाप सामने वाले घर की तरफ़ चल दी।

दरवाज़े की घंटी बजाते ही एक लड़की ने दरवाज़ा खोला। वह शायद उसी की उम्र की थी।

बाला ने देखा कि वह लड़की पीले रंग की सुन्दर सी फ्रॉक पहने हुए थी और उसके बालों में भी पीली तितली की चिमटी लगी थी।

हाथ में भी पीले और लाल रंग का कड़ा था और पैरों में सुन्दर सी चप्पल।

बाला ने अपनी बदरंग फ्रॉक की ओर देखा और सिर झुकाते हुए बोली – “मम्मी ने आज मुझे बर्तन माँजने के लिए भेजा है”।

“तुम्हें!” उस लड़की ने आश्चर्य से कहा।

तभी आंटी आ गई और उसे देखकर बोली – “अरे बाला तुम, आओ बेटा, अंदर आओ”।

बाला को आंटी बहुत पसंद थी। वह हमेशा उससे अच्छे से बोलती थी और उसे खाने पीने का सामान भी देती थी।

तभी आंटी बोली – “ये मेरी बेटी चारु है”।

बाला का मन हुआ कि उसे हैलो करे। पर संकोच के कारण कह ना सकी।

“मम्मी, ये बर्तन कैसे माँजेगी। मुझे ये मेरे ही बराबर लग रही है” चारु ने बाला को देखते हुए कहा।

“हाँ… तुम एक काम करो, तुम सिर्फ़ झाड़ू लगा दो। बर्तन मैं कर लूँगी और शाम को अपनी मम्मी को ज़रूर भेज देना।

बाला को लगा कि वह आंटी के गले लग जाए।

उसने तुरंत झाड़ू उठा ली और ख़ुशी ख़ुशी सफ़ाई करने लगी।

तभी कुछ बच्चे आये और चारु उनके साथ बात करने लगी। बाला समझ गई कि वे सब चारु के दोस्त थे।

चारु लगा तो झाड़ू रही थी पर उसका पूरा ध्यान उनके हँसी ठहाकों पर था। वे सब कितना खुश थे। कितने अच्छे कपड़े पहने थे।

तभी चारु बोली – “हम साथ साथ में पटाखे लाने चलेंगे”।

“हाँ, वो भी ईको फ्रेंडली…” लाल शर्ट पहने हुए एक लड़का बोला।

“क्योंकि पिछले बार इसके चश्मे के अंदर ही धुंआ चला गया था” कहते हुए एक दूसरा बच्चा जोरो से हँसा।

“ये कोई हँसने की बात नहीं है, पता है चार दिन तक इसकी आँखें सूजी हुई थी” चारु ने जवाब दिया।

बातें करते हुए वे चारों बच्चे कमरे से बाहर निकल आये।

उनकी नज़र बाला पर पड़ी तो बाला तुरंत फ़र्श की ओर देखने लगी।

तभी नीली फ्रॉक पहने हुए एक लड़की बाला के पास आई और बोली – “तुम्हारी चोटी कितनी सुन्दर है”।

“हाँ, इसके बाल बहुत लम्बे है ना” लाल शर्ट वाला लड़का बोला।

बाला मुस्कुरा दी। उसे अपनी तारीफ़ सुनकर बहुत अच्छा लगा।

तभी नीली फ्रॉक वाली लड़की ने बाला से पूछा – “क्या तुम दिवाली में पटाखे फोड़ती हो”?

बाला सकपका गई और बोली – “हाँ …”

“अरे वाह, फिर तो बड़ा मज़ा आएगा तुम अपने पटाखे भी यहाँ ले आना, हम सब मिलकर फोड़ेंगे” चारु मुस्कुराते हुए बोली।

बाला ने सिर हिला दिया और झाड़ू लगाने लगी।

जब बाला चलने को हुई तो चारु की मम्मी उसे एक पैकेट पकड़ाते हुए बोली – “बेटा, ये मिठाई रख लो”।

मिठाई तो बाला ने कितने दिनों से नहीं खाई थी इसलिए उसने ख़ुशी ख़ुशी पैकेट को कस के पकड़ लिया।

वह रास्ते भर चारु ओर उसके दोस्तों के बारें में सोचती रही। कहाँ से लाएगी वह पटाखें, माँ के पास तो पैसे ही नहीं है।

तभी सामने से उसका दोस्त गोलू अपने पापा के साथ जाते हुए दिखा।

पापा की याद करते ही बाला की आँखें भर आई। अगर आज उसके भी पापा होते तो कहीं ना कहीं से उसके लिए भी पटाखे जरूर लेकर आते।

घर पहुँचकर उसने देखा तो माँ अभी तक काम से नहीं लौटी थी।

उसने पैकेट खोलकर मिठाई खाई और आधी माँ के लिए बचा कर रख दी।

शाम को माँ आई तो उनके हाथ में कुछ सामान था।

“माँ, क्या पटाखे ले आई। चारु कह रही थी कि मैं भी अपने पटाखे लेकर उसके घर चली जाऊँ और उसके साथ फोड़ू। चारु बहुत अच्छी है।” कहते हुए बाला की आँखें चमक उठी।

पर माँ की आँखों में आँसूं देखते ही वह चुप हो गई। कुछ देर बाद वह बोली – “माँ, वैसे भी पटाखे फोड़ने में मज़ा कहाँ आता है आग लगा कर दौड़ते रहो और कई बार तो जल भी जाते है, हैं ना माँ?”

माँ ने रुलाई रोकते हुए बाला को सीने से लगा लिया।

सुबह का गुबार बह निकला ओर दोनों रो पड़ी।

दिवाली के दिन बाला ने माँ के साथ मिलकर अपना घर साफ़ किया।

माँ बोली – “मैं थोड़ी देर में ही आ जाउंगी। आज सिर्फ़ थोड़ी देर का ही काम है”।

बाला बोली – “जल्दी आना माँ, हम दोनों साथ में दिये जलाएँगे”।

माँ का दिल भर आया। वह कई घरों में काम करने के बाद चारु के घर पहुँची तो चारु बोली – “आंटी, बाला नहीं आई। मैंने उसे अपने पटाखें यहीं पर लाने के लिए कहा था”।

वह कुछ जवाब देती इससे पहले ही चारु की मम्मी बोली – “चारु, जरा पानी से दिये निकालकर पंखे के नीचे सूखने के लिए रख दो”।

और चारु दौड़ते हुए वहाँ से चली गई।

चारु की मम्मी ने शांता को कुछ रुपये और मिठाई दी।

पर शांता को समझ नहीं आ रहा था कि इन रुपयों पैसे से पटाखे ख़रीदे या फिर पूरे महीने के घर खर्च में इस्तेमाल करे। यही सोचते हुए घर आ गया ओर शांता ने पटाखो की आख़िरी दूकान भी पार कर ली।

माँ के हाथ में पटाखें ना देखकर बाला के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई।

वह एक दिन में ही जैसे बहुत समझदार हो गई थी।

रात होते ही आतिशबाज़ियों और पटाखों की रौशनी से शहर जगमगा उठा।

बाला के आस पास के बच्चे भी बहुत थोड़े ही पटाखे लाये थे और उन्हीं को चलकर खुश हो रहे थे।

बाला और उसकी माँ भी उन बच्चों को देखकर मुस्कुरा रहे थे।

तभी सड़क पर एक कार आकर रुकी और उसमें से सबसे पहले एक लड़की उतरी।

“माँ… देखो चारु…” बाला ख़ुशी से चिल्लाई।

माँ ने देखा कि चारु अपने मम्मी पापा के साथ उसकी ओर चली आ रही थी।

उसकी मम्मी के हाथ में एक बड़ा सा थैला था।

उनको देखकर आसपास के बच्चे भी बाला के पास आकर खड़े हो गए।

बाला कुछ समझती इससे पहले ही चारु बोली – “तुम तो आई नहीं इसलिए मैं ही अपने पटाखे लेकर यहाँ आ गई”।

बाला के पैर काँप उठे। उसने अपनी फ्रॉक के बारे में नहीं सोचा, ना अपने घर के बारे में ओर ना ही अपनी चप्पल के बारे में, वह आगे बढ़कर चारु के गले लग गई और जोर जोर से रोने लगी।

चारु उसकी पीठ पर हाथ फेर रही थी और बाला तो रोये जा रही थी। ख़ुशी के आँसुओं के साथ ही उसके आस पास सब कुछ जगमगा रहा था।

~ डॉ. मंजरी शुक्ला [बाल भास्कर में भी प्रकाशित]

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