गंभीर उदासी के लक्षण इस प्रकार है:
- लगातार उदास, बेचैन या मूड का खालीपन।
- थकान महसूस करना सुस्त हो जाना।
- आम कार्यों या सरगार्मियों में अरुचि।
- स्वयं को दोषी समझना।
- निराशा व नाउम्मीदी की भावनाए।
- चिंतित रहना।
- पढाई में अरुचि।
- विद्यालय न जाने के बहाने करना।
- बहुत अधिक टेलीविजन देखना।
- शारीरिक रोगों की शिकायत करना।
- भूख में परिवर्तन।
- वजन कम होना या बढ़ जाना।
- खाने में अधिक रूचि लेना।
- तर्क शक्ति का कम प्रयोग।
- भविष्य के प्रति असुरक्षित अनुभव करना।
- अपेक्षित आत्म-विश्वास की कमी।
- अचेतन स्तर पर भय और चिंता।
- संबंधों में नीरसता।
- क्षमताओं का उपयोग न कर पाना।
- आत्महत्या या मृत्यु के विचार मन में आना। आत्महत्या के बारे में मजाक(ठिठोली) करना, बातों-बातों में मरने के बारे में या मृत्यु को सम्बोधन।
- आत्महत्या की कोशिश या नाटक करना।
- ध्यान केन्द्रित करने, स्मरण करने तथा निर्णय लेने में कठिनाई होना।
- खीझ और चिड़चिड़ापन।
बहुत बार यह उदासी रोग, शारीरिक रोगों के लक्षणों का रूप ले लेता है, जैसे आधे सिर में दर्द (Migraine), पेट दर्द इत्यादि जो कि दवाइयों से ठीक नहीं होते। घरेलू तथा आसपास के वातावरण में ज्यादा दबाव (तनाव) के कारण और इस दबाव के काफी देर रहने से भी बच्चे उदास रहते हैं। स्वयं को किसी काम के योग्य न समझना, दूसरों पर ज्यादा निर्भर होना, गुस्सा तथा रोष जैसे मन के विचारों को प्रकट करने का मौका न मिलना या संवेगों को समान्य ढंग से जाहिर न कर पाना भी उदासी को बढ़ाते हैं।
उदासी बच्चों में धीरे-धीरे चुस्ती व स्फूर्ति के साथ-साथ स्वाभिमान को भी कम कर देती है। वे थके-थके रहते हैं और कुछ भी करने में दिलचस्पी नहीं दिखाते। उदासी रोग अहम्, आत्म-सम्मान, आत्म-निर्भरता तथा अपने आप में विश्वास समाप्त कर देता है। छोटे से छोटे काम के लिए भी प्रेरित करना पड़ता है।
बच्चों में उदासी रोग में सहायक परामर्श एवं सुझाव:
- माता-पिता, अभिभावक व अध्यापक ‘उदासी रोग’ के बारे में सूचनाएं एकत्र करके उनका आदान-प्रदान करें।
- बच्चों को कभी भी बोझ न समझें। मजाक में भी उन्हें नकारात्मक सम्बोधन न दें।
- तर्क शक्ति में विकास के लिए विचारों का आदान-प्रदान घर से शुरू करें। पारितोषिक भी बच्चों को प्रेरणा देते हैं।
- दूसरों के प्रति स्वस्थ और वास्ताविक्तापरक दृष्टिकोण विकासित करने के लिए बच्चों की भावनाओं का सम्मान करें। उनकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति को बढ़ावा दें। उनकी रुचियों का विकास करें।
- बच्चों को महसूस कराएं कि परिवार के सदस्य उनका ध्यान रखते हैं, उनका आदर करते हैं, उन्हें स्वीकारते हैं, उनकी बात को महत्व देते हैं। इससे बच्चे को स्वाभिमान तथा आत्म-विश्वास पुनः प्राप्त करने में आसानी होगी। आवश्यक स्नेह, ध्यान, सुरक्षा, विचारों व समस्याओं का आदान-प्रदान, सम्मानजनक संबंध रोग का सामना करने में सहायक हैं। मनोरंजन, खेलकूद व त्यौहार भी उदासी कम करते हैं।
- बच्चे को किसी भी कार्य में लगा कर रखें। सुस्त न होने दें। सुबह जल्दी उठकर क्रियाशील होना सिखाएं। सैर, व्यायाम तथा अपने शरीर का ध्यान रखने पर बल दें। अच्छे व्यवहार के लिए दूसरों के सामने कभी भी बच्चों की बुराई न करें। विशिष्ट व्यवहार के बारे में बच्चो से पहले चर्चा करें व उसका मर्म जानने की कोशिश करें।
- पैसों से अधिक समय व संबंधों को महत्व दें। बच्चों के साथ अच्छा समय बिताएं। समय की मात्रा की अपेक्षा बच्चों के साथ समय की गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान दें। अच्छे व्यवहार के लिए सम्मान दें।
- मनोवैज्ञानिक परामर्श लेने में संकोच न करें। दूसरे मिलने वालों की सहायता भी लें।
- शशकासन, ताड़ासन, भुजंगासन, धनुरासन, सर्वांगासन, शवासन कराएं।
- भ्रामरी प्राणायाम, लम्बे-गहरे सांसों का अभ्यास कराएं।
- योगा निद्रा में प्रसन्नता, आत्म-निर्भरता मनोबल पर बल दें।
~ डॉ. पद्मनाभ वासुदेव
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