रामू की मां शांता बहुत गरीब थी। उसके पिता का देहांत चार साल पहले हो चुका था। तब से मां ही घर और बाहर, दोनों जिम्मेदारियां अकेले निभा रही थी।
रोज सुबह वह अपने सिर पर खिलौनों की टोकरी रखकर शहर की गलियों में निकल पड़ती। वही उसकी आजीविका का एकमात्र साधन था।
रामू अभी केवल 5 साल का था। मां उसे घर पर अकेला छोड़ नहीं सकती थी, इसलिए वह उसे अपने साथ ही ले जाती। नन्हा रामू भी मां के साथ गलियों में मासूम आवाज में पुकार लगाता, “खिलौने ले लो… रंग-बिरंगे खिलौने।”
धीरे-धीरे मोहल्ले के लोग शांता को “खिलौने वाली” के नाम से पहचानने लगे थे। एक दिन शांता एक बड़े बंगले के सामने से गुजर रही थी। तभी भीतर से आवाज आई, “अरी खिलौने वाली, जरा रुकना।”
खिलौने वाली: गोविंद भारद्वाज
शांता तुरंत रुक गई। बंगले से एक सजी-धजी मेम साहब बाहर आईं और खिलौनों को ध्यान से देखने लगीं।
“यह मछली वाला खिलौना कितने का है?” उन्होंने पूछा।
“बहन जी, पचास रुपए।” शांता ने विनम्रता से उत्तर दिया।
यह सुनते ही मेम साहब चौंक पड़ीं, “इतना महंगा? यह तो बाजार में तीस रुपए में मिल जाता है।”
इतने में रामू बोल पड़ा, “आंटी, आप बाजार से ही खरीद लेना, यहां महंगा क्यों लेना?”
मेम साहब मुस्कुरा दीं, “अरे, यह छोटा-सा लड़का तो अपनी मां से भी ज्यादा समझदार है। बड़ा होकर जरूर कुछ बनेगा।”
यह सुनकर शांता का चेहरा उतर गया। वह बोली, “क्या बनेगा, मेम साहब? पढ़ेगा-लिखेगा तो ही न। मेरी तरह गली-गली खिलौने ही बेचेगा।”

मेम साहब ने आश्चर्य से कहा, “क्यों नहीं पढ़ेगा? इसका स्कूल में दाखिला कराओ।”
शांता बोली, “मेम साहब, मुझ जैसी गरीब औरत के पास पढ़ाने के पैसे कहां?”
इस पर मेम साहब ने समझाते हुए कहा, “गरीबी का बहाना मत बनाओ। सरकार ने सब बच्चों को शिक्षा का अधिकार दिया है। सरकारी स्कूलों में मुफ्त दाखिला, किताबें और मिड-डे मील तक मिलता है।”
“मिड-डे मील?” शांता ने अनजान होकर पूछा।
“दोपहर का खाना,” कहकर मेम साहब हंस पड़ीं।
शांता थोड़ी झिझकते हुए बोली, “पर मैं तो अपने बेटे को पब्लिक स्कूल में पढ़ाना चाहती हूं।”
“तुम पब्लिक स्कूल के बारे में जानती हो?” मेम साहब ने पूछा।
“हां, जहां अंग्रेजी बोली जाती है, बच्चा बाबू की तरह तैयार होकर जाता है, बस लेने आती है,” शांता ने सपनों भरी आंखों से कहा।
मेम साहब मुस्कराईं, “आजकल प्राइवेट स्कूलों में भी शिक्षा के अधिकार के तहत गरीब बच्चों को 25 प्रतिशत सीटें मिलती हैं। तुम कोशिश करना”।
रामू ने उत्साह से पूछा, “आंटी, आप मेरा अंग्रेजी स्कूल में एडमिशन कराओगी?”
कुछ सोचकर मेम साहब बोलीं, “मैं कोशिश करूंगी, लेकिन एक शर्त है”।
“क्या?” शांता ने घबराकर पूछा।
“रामू को खिलौने बेचने नहीं ले जाओगी और रोज एक घंटा मेरे पास पढ़ने भेजोगी”।
शांता चिंतित हो गई, “पर ट्यूशन के पैसे?”
“कोई पैसे नहीं,” मेम साहब ने स्नेह से कहा। “मैं इसे अपने बच्चों के साथ मुफ्त पढ़ाऊंगी। एक और बात, तुम विदेशी खिलौने मत बेचा करो। देश में बने खिलौने बेचो। मैं अपनी सोसाइटी और रिश्तेदारों से भी वही खरीदने को कहूंगी”।
रामू मासूमियत से बोला, “पर आंटी, आप तो अभी चीनी खिलौना ले रही थीं”।
मेम साहब हंस पड़ीं, “आज आखिरी बार, रामू”।
शांता की आंखें भर आईं। उसने हाथ जोड़कर कहा, “मेम साहब, आपका यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी।”
रामू खुशी से झूम उठा। उसे यकीन हो गया था कि अब उसका भविष्य किताबों और सपनों से भरा होगा।
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