अंकुर का कमाल - चैतन्य

अंकुर का कमाल – चैतन्य

अंकुरों की बात सुनते ही मुखिया उत्तेजित सा हो उठा, “तरकीब अच्छी है। एकाएक अंकुर का पीछा करते हुए लुटेरों के घर तक पहुंच सकते हैं। जिस घर तक बीज का अंकुर निकला होगा। उसी घर तक सरसों की बोरियां ले जाई गई होंगी और उसी घर के लोग ही लुटेरे होंगे। लुटेरों में से एक भी पकड़ा गया तो उस के सभी साथी जरूर पकड़ लिए जाएंगे। चलो, थाने चलते हैं।”

मुखिया रामधन की बातो से भोलाशंकर के चेहरे पर सुर्खी छा गई। मन में इस बात की प्रसन्ता हुई कि चलो लूट का सामान न भी मिले पर लुटेरे पकड़े जाएं तो सब का कल्याण होगा।

दोनों एक ही साइकिल पर थाने पहुंचे। मुखिया ने लूट की घटना के बारे में लिखित रिपोर्ट पेश की। आधे घंटे में चार सिपाही और दारोगा जीप पर सवार हो गए। साइकिल वहीँ छोड़ कर मुखिया रामधन और भोलाशंकर भी जीप के पीछे लटक गए।

लूट के स्थान पर जीप रुक गई। रास्ते में सरसों के बीजों के अंकुरों का पीछा करते हुए आगे-आगे मुखिया रामधन, भोलाशंकर व दारोगा और पीछे-पीछे सिपाही पैदल ही चल दिए।

वह रास्ता सड़क से एक बस्ती की तरफ जा रहा था। सड़क से वह बस्ती लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर थी और पूरे रास्ते में गिरे बीजों के अंकुर निकल चुके थे।

थोड़ी ही देर में सब बस्ती में पहुंच गए। बस्ती में सब से पहले छोटे-छोटे बच्चों के भय ने उन का स्वागत किया। सिपाहियों को देख कर कुछ बच्चे चिल्लाते हुए घरों में घुस गए। कुछ बुजुर्ग लोग घरों से बाहर आ गए और दारोगा से नमस्कार के ले उन लोगों के साथ हो लिए। अंकुरों की पंक्ति आखिर एक घर के आंगन में जा कर खत्म हो गई।

Policemanदारोगा ने उसी बस्ती के एक आदमी से पूछा, “यह किस का घर है?”

“प्रताप का,” उस आदमी ने सीधा सा जवाब दिया।

“कौन है प्रताप? बुलाओ उसे”, दारोगा ने सख्ती से हिदायत दी। लूट के संबंध में इतनी आसानी से सुराग मिल जाएगा, लुटेरों को जरा भी अंदेशा नहीं था। उन्हें पकड़ पाने के लिए तो कुछ सुबूत चाहिए था।

पर लुटेरों को पकड़वाने के लिए बोरियों से गिरे सरसों के बीज कैसाकैसा रहस्यमय जाल बुन रहे थे। यह लुटेरों को मालूम नहीं था। इसलिए आंगन में किसी अपरिचित व्यक्ति की भारीभरकम व् रोबदार आवाज सुन कर प्रताप घर से निकला, सामने दारोगा को देख कर हतप्रभ हो गया। बोला:

“साहब क्या बात है? मेरा ही नाम प्रताप है।”

सिपाहियों ने झटपट प्रताप को जकड़ लिया।

दारोगा ने पूछा, “उस रात भोलाशंकर अपनी बैलगाड़ी से चार बोरी सरसों के बीज और दुकानदारी का कुछ सामान ला रहा था, रास्ते में तुम लोगों ने उसे लूट लिया। उस समय तुम्हारे साथ इस बस्ती के और कौन-कौन लोग थे?”

“साहब, हम ने किसी को नहीं लूटा है।” कांपते हुए प्रताप बोला।

“झूठ मत बोलो। सुबूत के लिए सरसों के अंकुर ही काफी हैं। चोर अपनी चोरी से किसी का घर साफ़ तो कर देता है, लेकिन अपने घर तक पहुंचने के लिए भी खुद ही रास्ता साफ़ करता है। सामान के साथ सरसों की चार बोरियां भी तुम लूट कर लाए थे। उन्ही बोरियों के बीजों का कमाल है कि हम तुम्हें पकड़ने में कामयाब हो सके, “दारोगा ने कहा।

अंकुर देख कर प्रताप की आंखे फ़टी की फ़टी रह गई। अब कानून के चंगुल से बच निकलना संभव नहीं था, इसलिए प्रताप ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और अपने दूसरे साथियों के नाम भी बता दिए।

उस के साथी दूसरी बस्ती के रहने वाले थे। दारोगा ने उस बस्ती में जा कर एकएक कर सब को गिरफ्तार कर लिया और जेल भेज दिया।

लुटेरों को पकड़वाने के लिए भोलाशंकर ने जिस सूझबूझ से मुखिया की मारफत थाने में रिपोर्ट की, उस के लिए दारोगा ने भोलाशंकर को शाबाशी दी।

लुटेरों को ले कर भोलाशंकर के मन में तीनचार दिनों तक जो भय समाया रहा था वह मन से सदा के लिए दूर हो गया।

∼ चैतन्य

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