दिन होली के - यतीन्द्र राही

दिन होली के: यतीन्द्र राही की होली पर हिंदी बाल कविता

होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है।

राधा-श्याम गोप और गोपियों की होली: इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से ३०० वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं।

सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है। शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे। मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।

दिन होली के: यतीन्द्र राही

गीत फाग के, दिन मस्ती के
उलझन-झिड़क ज़बरदस्ती के
बौरे-बहके-गंधनशीले
रूप दहकते रंग गरबीले
धरते पाँव सँवार झूमते
जैसे हों कहार डोली के
दिन होली के।

टिमकी ढोलक, बजे मंजीरे
ताल-स्वरों के चरन अधीरे
ढप पर थाप, झाँझ पर झोके
मन मचले, रोके ना रोके
नचती राधा हुई बावरी
कान्हा कहीं किसी टोली के
दिन होली के।

उड़त गुलाल लाल भए बादर
आसमान रंगों की झालर
झरे अबीर चले पछवैया
आँगन बोले सोन चिरैया
मन के द्वार, नयन के पनघट
रंग बिखरते मिठबोली के
दिन होली के।

यतीन्द्र राही

आपको यतीन्द्र राही जी की यह कविता “दिन होली के” कैसी लगी – आप से अनुरोध है की अपने विचार comments के जरिये प्रस्तुत करें। अगर आप को यह कविता अच्छी लगी है तो Share या Like अवश्य करें।

Check Also

4th of July Night - Carl Sandburg

4th of July Night: USA Independence Day Poetry

America’s Independence Day, also referred to as the Fourth of July or July Fourth, is …