बातचीत की कला - राजीव कृष्ण सक्सेना

बातचीत की कला – राजीव कृष्ण सक्सेना

समाज से मेरा रिश्ता
मेरी पत्नी के माध्यम से है
सीधा मेरा कोई रिश्ता बन नहीं पाया है
सब्जी वाला
दूध वाला
अखबार वाला
धोबी हो या माली
सबकी मेरी पत्नी से बातचीत होती रहती है
बस मुझे ही समझ नहीं आता कि
इन से बात करूँ तो क्या करूँ
पर मेरी पत्नी
सहज भाव से
इन सब से खूब बात कर सकती है
कूछ भगवान का वरदान है उसे
मुझे अक्सर ईर्षा होती है
मुझमें यह हुनर
क्यों नहीं है
जब पत्नी किसी आस पड़ोसी से
बात कर रही होती है
तब मैं चुपचाप पीछे से
मुँह छुपा कर निकल जाता हूँ
“बहुत बिज़ी रहते हैं”
पत्नी उन से बहाना बनाती है
पर सच तो यह है कि
मैं इतना बिज़ी नहीं हूँ
आराम से बातचीत करने का समय
निकाल सकता हूँ
पर मुझे ही समझ नहीं आता कि
इन से बात करूँ तो क्या करूँ

~ राजीव कृष्ण सक्सेना

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