15 अगस्त 1947 - शील

15 अगस्त 1947 – शील

आज देश मे नई भोर है –
नई भोर का समारोह है।

आज सिन्धु-गर्वित प्राणों में
उमड़ रहा उत्साह
मचल रहा है
नए सृजन के लक्ष्य बिन्दु पर
कवि के मुक्त छन्द-चरणों का
एक नया इतिहास।

आज देश ने ली स्वंत्रतता
आज गगन मुस्काया।
आज हिमालय हिला
पवन पुलके
सुनहली प्यारी-प्यारी धूप।
आज देश की मिट्टी में बल
उर्वर साहस –
आज देश के कण-कण
ने ली
स्वतंत्रता की साँस।

युग-युग के अवढर योगी की
टूटी आज समाधि
आज देश की आत्मा बदली
न्याय नीति संस्कृति शासन पर
चल न सकेंगे –
अब धूमायित-कलुषित पर संकेत
एकत्रित अब कर न सकेंगे, श्रम का सोना
अर्थ व्यूह रचना के स्वामी
पूंजी के रथ जोत।

आज यूनियन जैक नहीं
अब है राष्ट्रीय निशान
लहराओ फहराओ इसको
पूजो-पूजो-पूजो इसको
यह बलिदानों की श्रद्धा है
यह अपमानों का प्रतिशोध
कोटि-कोटि सृष्टा बन्धुओं को
यह सुहाग सिन्दूर।

यह स्वतंत्रता के संगर का पहला अस्त्र अमोध
आज देश जय-घोष कर रहा
महलों से बाँसों की छत पर नई चेतना आई
स्वतंत्रता के प्रथम सूर्य का है अभिनंदन-वन्दन
अब न देश फूटी आँखों भी देखेगा जन-क्रन्दन
अब न भूख का ज्वार-ज्वार में लाशें
लाशों में स्वर्ण के निर्मित होंगे गेह
अब ना देश में चल पाएगा लोहू का व्यापार
आज शहीदों की मज़ार पर
स्वतंत्रता के फूल चढ़ाकर कौल करो
दास-देश के कौतुक –करकट को बुहार कर
कौल करो।

आज देश में नई भोर है
नई भोर का समारोह है।

∼ मन्नू लाल शर्मा ‘शील’

About Sheel

शील जी के नाम से जाने जाने वाले मन्नू लाल शर्मा शील का जन्म १५ अगस्त १९१४ को हुआ था। क्रांतिकारी विचारों और जूझारू व्यक्तित्व के स्वामी शील जी अपने समय के लोकप्रिय नाटककार और कवियों में से थे। उनका निधन २३ नवंबर १९९४ को हुआ। चर्खाशाला, उदयपथ, एक पग, अंगड़ाई, लावा और फूल, कर्मवाची शब्द हैं ये तथा लाल पंखों वाली चिड़िया उनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियाँ हैं। किसान, तीन दिन तीन घर तथा हवा का रुख शीर्षक से उनके तीन नाटक लोक भारती प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित हुए थे। ये नाटक बाद में शील रचनावली-१ के नाम से भी प्रकाशित हुए। किसान नामक उनका नाटक रंगमंच पर भी बहुत लोकप्रिय हुआ था। उन्होंने कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया। कवि शील का जन्म 15 अगस्त 1914 ई. में कानपुर ज़िले के पाली गाँव में हुआ । शील जी सनेही स्कूल के कवि हैं वे आज़ादी के आन्दोलन में कई बार जेल गये । गान्धीजी के प्रभाव मे “चर्खाशाला” लम्बी कविता लिखी । व्यक्तिगत सत्याग्रह से मतभेद होने के कारण गान्धी का मार्ग छोड़ा तथा भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी में शामिल हुए । “मज़दूर की झोपड़ी” कविता रेडियो पर पढ़ने के कारण लखनऊ रेडियो की नौकरी छोड़नी पड़ी ।चर्खाशाला, अंगड़ाई, एक पग, उदय पथ, लावा और फूल , कर्मवाची शब्द आपकी काव्य रचनायें है तथा तीन दिन तीन घर, किसान, हवा कारुख, नदी और आदमी, रिहर्सल, रोशनी के फूल, पोस्टर चिपकाओ आदि आपके नाटक हैं ।उनके कई नाटकों को पृथ्वी थियेटर द्वारा खेला गया यहाँ तक कि रशिया में भी उनके शो हुए तथा राजकपूर ने उनमें अभिनय किया।

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