गुरु पूर्णिमा: गुरु-शिष्य के पवित्र बंधन का पर्व: Festival of Guru-Disciple Bonding

गुरु पूर्णिमा: गुरु-शिष्य के पवित्र बंधन का पर्व: Festival of Guru-Disciple Bonding

गुरु पूर्णिमा: गुरु-शिष्य के पवित्र बंधन का पर्व – जब से गुरु-शिष्य परपरा का प्रादुर्भाव हुआ है तब से गुरु पूर्णिमा महोत्सव मनाया जा रहा है। आज ए.आई. (आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस) और इंटरनैट का युग है, तब भी हमें टीचर, उस्ताद या मार्गदर्शक की जरूरत है।

गुरु पूर्णिमा: गुरु-शिष्य के पवित्र बंधन का पर्व

कोई भी क्षेत्र हो, छोटे से छोटा या बड़े से बड़ा, बढ़ई हो, मिस्त्री हो, इंजीनियर हो या फिर डॉक्टर, इनको महारत हासिल करने के लिए टीचर, उस्ताद या अच्छे जानकार की जरूरत पड़ती है।

इसी तरह से अध्यात्म में भी आत्म साक्षात्कार के लिए सद्‌गुरु की जरूरत है। जैसे कि बुल्ले शाह जी के शब्द हैं, ‘बुलिया की जाने मैं कौन‘, इस ‘कौन’ को जानने के लिए ही सद्‌गुरु की जरूरत है इसलिए सनातन धर्म में दैहिक गुरु की जरूरत पर जोर दिया गया है।

ज्ञान तो किताबों से भी मिल सकता है परंतु उससे आत्म कल्याण नहीं हो सकता। समाज में विचार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं परंतु जैसे जीवित रहते हुए माता-पिता अपने बच्चों का हित कर सकते हैं, मरणोपरांत नहीं, वैसे ही स्थूल शरीर में विराजमान पूर्ण सद्‌गुरु अपने शिष्य रूपी बच्चों का उचित मार्गदर्शन व हित कर सकते हैं।

इसलिए हमें पूर्ण सद्‌गुरु की खोज करनी है और मिल जाने पर उनके सामने नतमस्तक हो, आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए। गुरु-शिष्य के बीच का पवित्र बंधन बना रहे, यही गुरु पूर्णिमा का उद्देश्य है।

~ स्वामी गुरबख्श राय (योग साधन आश्रम, अमृतसर)

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