रंग-बिरंगे गुब्बारे
घड़ी
घड़ी लगी दीवार पर, टिक टिक कर तू चलती है। हर घंटे के बाद तू, डिंग डिंग करके बजती है। तुझे देखकर पता है चलता, कब खाना, कब पढ़ना है। तुझे देखकर पता है चलता, कब उठना, कब सोना है।
Read More »पापा ऑफिस गए – प्रभुदयाल श्रीवास्तव
मेरे पापा मुझे उठाते, सुबह-सुबह से बिस्तर से। और बिठाकर बस में आते, बिदा रोज करते घर से। भागदौड़ इतनी होती है, सब मशीन बन जाते हैं। मेरे शाला जाने पर सब, फुरसत से सुस्ताते हैं। तारक शाला चला गया है, अभी बिदा हुई मीता है। मम्मी कहती पानीपत का, युद्ध अभी ही जीता है। बच्चों के शाला जाने की, …
Read More »चंपा और चमेली – प्रतिभा सक्सेना
चंपा ने कहा, ‘चमेली, क्यों बैठी आज अकेली क्यों सिसक-सिसक कर रोतीं, क्यों आँसू से मुँह धोतीं क्या अम्माँ ने फटकारा, कुछ होगा कसूर तुम्हारा या गुड़ियाँ हिरा गई हैं या सखियाँ बिरा गई हैं। भइया ने तुम्हें खिजाया, क्यों इतना रोना आया? अम्माँ को बतलाती हूँ, मैं अभी बुला लाती हूँ’ सिसकी भर कहे चमेली, ‘मैं तो रह गई …
Read More »आ री आजा निंदिया तू – कुंवारा बाप
~ मजरूह सुल्तानपुरी
Read More »आजा री निंदिया आजा – प्रतिभा सक्सेना
आजा री निंदिया आजा, मुनिया/मुन्ना को सुला जा मुन्ना है शैतान हमारा रूठ बितता है दिन सारा हाट-बाट औ’अली-गली में नींद करे चट फेरी शाम को आवे लाल सुलावे उड़ जा बड़ी सवेरी। आजा निंदिया आजा तेरी मुनिया जोहे बाट सोने के हैं पाए जिसके रूपे की है खाट मखमल का है लाल बिछौना तकिया झालरदार सवा लाख हैं मोती …
Read More »मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो गई है
मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो गई है कुछ जिद्दी, कुछ नक् चढ़ी हो गई है मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो गई है। अब अपनी हर बात मनवाने लगी है हमको ही अब वो समझाने लगी है हर दिन नई नई फरमाइशें होती है लगता है कि फरमाइशों की झड़ी हो गई है मेरी बेटी थोड़ी सी बड़ी हो …
Read More »टल नही सकता – कुंवर बेचैन
मैं चलते – चलते इतना थक्क गया हूँ, चल नही सकता मगर मैं सूर्य हूँ, संध्या से पहले ढल नही सकता कोई जब रौशनी देगा, तभी हो पाउँगा रौशन मैं मिटटी का दिया हूँ, खुद तो मैं अब जल नही सकता जमाने भर को खुशियों देने वाला रो पड़ा आखिर वो कहता था मेरे दिल में कोई गम पल नही …
Read More »सद्य स्नाता – प्रतिभा सक्सेना
झकोर–झकोर धोती रही, संवराई संध्या, पश्चिमी घात के लहराते जल में, अपने गौरिक वसन, फैला दिये क्षितिज की अरगनी पर और उत्तर गई गहरे ताल के जल में डूब–डूब, मल–मल नहायेगी रात भर बड़े भोर निकलेगी जल से, उजले–निखरे सिन्ग्ध तन से झरते जल–सीकर घांसो पर बिखेरती, ताने लगती पंछियों की छेड़ से लजाती, दोनो बाहें तन पर लपेट सद्य – …
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