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बच्चे शरारती क्यों-Learn How to handle naughty kids

बच्चे शरारती क्यों-Learn How to handle naughty kids

आज के अधिंकांश मां-बाप को शिकायत रहती है की उनके बच्चे बहुत उच्छृंखल हो गए हैं। उन्हें सम्मान नहीं देते हैं। दूसरों के सामने उनकी बेइज़्ज़ती कर देते हैं। कई बार तो ऐसी हरकतें करते हैं जिनके लिए मां-बाप को शर्मिंदा होना पड़ता है। वास्तव में यह एक चिंता का विषय है। क्या कभी हमने यह सोचा है की बच्चे …

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सूरज डूब चुका है – अजित कुमार

सूरज डूब चुका है‚ मेरा मन दुनिया से ऊब चुका है। सुबह उषा किरणों ने मुझको यों दुलराया‚ जैसे मेरा तन उनके मन को हो भाया‚ शाम हुई तो फेरीं सबने अपनी बाहें‚ खत्म हुई दिन भर की मेरी सारी चाहें‚ धरती पर फैला अंधियारा‚ रंग बिरंगी आभावाला सूरज डूब चुका है‚ मेरा मन दुनिया से ऊब चुका है। फूलों …

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शीशे का घर – श्रीकृष्ण तिवारी

जब तक यह शीशे का घर है तब तक ही पत्थर का डर है आँगन–आँगन जलता जंगल द्वार–द्वार सर्पों का पहरा बहती रोशनियों में लगता अब भी कहीं अँधेरा ठहरा। जब तक यह बालू का घर है तब तक ही लहरों का डर है टहनी–टहनी टंगा हुआ है जख्म भरे मौसम का चेहरा गलियों में सन्नाटा पसरा। जब तक यह …

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सूने घर में – सत्यनारायण

सूने घर में कोने कोने मकड़ी बुनती जाल। अम्मा बिन आंगन सूना है बाबा बिन दालान‚ चिठ्ठी आई है बहिना की सांसत में है जान‚ नित नित नये तकादे भेजे बहिना की ससुराल। भइया तो परदेस बिराजे कौन करे अब चेत‚ साहू के खाते में बंधक है बीघे भर खेत‚ शायद कुर्की जब्ती भी हो जाए अगले साल। ओर–छोर छप्पर …

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सोने के हिरन – कन्हैया लाल वाजपेयी

आधा जीवन जब बीत गया बनवासी सा गाते रोते तब पता चला इस दुनियां में सोने के हिरन नहीं होते। संबंध सभी ने तोड़ लिये चिंता ने कभी नहीं छोड़े सब हाथ जोड़ कर चले गये पीड़ा ने हाथ नहीं जोड़े। सूनी घाटी में अपनी ही प्रतिध्वनियों ने यों छला हमे हम समझ गये पाषाणों के वाणी मन नयन नहीं …

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स्मृति बच्चों की – वीरेंद्र मिश्र

अब टूट चुके हैं शीशे उन दरवाज़ों के जो मन के रंग महल के दृढ़ जड़ प्रहरी हैं जिनको केवल हिलना–डुलना ही याद रहा मस्तक पर चिंता की तलहटियाँ गहरी हैं कोई निर्मम तूफान सीढ़ियों पर बैठा थककर सुस्ताकर अंधकार में ऊँघ रहा ऊपर कोई नन्हें–से बादल का टुकड़ा कुछ खोकर जैसे हर तारे को सूंघ रहा यह देख खोजने …

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फूटा प्रभात – भारत भूषण अग्रवाल

फूटा प्रभात – भारत भूषण अग्रवाल

फूटा प्रभात‚ फूटा विहान बह चले रश्मि के प्राण‚ विहग के गान‚ मधुर निर्झर के स्वर झर–झर‚ झर–झर। प्राची का अरुणाभ क्षितिज‚ मानो अंबर की सरसी में फूला कोई रक्तिम गुलाब‚ रक्तिम सरसिज। धीरे–धीरे‚ लो‚ फैल चली आलोक रेख धुल गया तिमिर‚ बह गयी निशा; चहुँ ओर देख‚ धुल रही विभा‚ विमलाभ कान्ति। सस्मित‚ विस्मित‚ खुल गये द्वार‚ हँस रही …

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पथ-हीन – भारत भूषण अग्रवाल

कौन सा पथ है? मार्ग में आकुल–अधीरातुर बटोही यों पुकारा कौन सा पथ है? ‘महाजन जिस ओर जाएं’ – शास्त्र हुँकारा ‘अंतरात्मा ले चले जिस ओर’ – बोला न्याय पंडित ‘साथ आओ सर्व–साधारण जनों के’ – क्रांति वाणी। पर महाजन–मार्ग–गमनोचित न संबल है‚ न रथ है‚ अन्तरात्मा अनिश्चय–संशय–ग्रसित‚ क्रांति–गति–अनुसरण–योग्या है न पद सामर्थ्य। कौन सा पथ है? मार्ग में आकुल–अधीरातुर …

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नींद भी न आई (तुक्तक) – भारत भूषण अग्रवाल

नींद भी न आई, गिने भी न तारे गिनती ही भूल गए विरह के मारे रात भर जाग कर खूब गुणा भाग कर ज्यों ही याद आई, डूब गए थे तारे। यात्रियों के मना करने के बावजूद गये चलती ट्रेन से कूद गये पास न टिकट था टीटी भी विकत था बिस्तर तो रह ही गया, और रह अमरुद गये। …

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मैं और मेरा पिट्ठू – भारत भूषण अग्रवाल

देह से अलग होकर भी मैं दो हूँ मेरे पेट में पिट्ठू है। जब मैं दफ्तर में साहब की घंटी पर उठता बैठता हूँ मेरा पिट्ठू नदी किनारे वंशी बजाता रहता है! जब मेरी नोटिंग कट–कुटकर रिटाइप होती है तब साप्ताहिक के मुखपृष्ठ पर मेरे पिट्ठू की तस्वीर छपती है! शाम को जब मैं बस के फुटबोर्ड पत टँगा–टँगा घर …

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