Babasaheb Ambedkar

बाबा साहेब अम्बेदकर: एक महान योद्धा

बाबा साहेब अम्बेदकर जब तीसरी गोलमेज कांफ्रैंस के लिए लंदन के लिए रवाना हुए तो विमान में एक व्यक्ति ने उनकी ओर इशारा करते हुए अपने साथी से कहा, “यह वह नौजवान है जो भारतीय इतिहास के नए पन्ने लिख रहा है।”

सूबेदार राम जी ने तब सपने में भी नहीं सोचा  होगा कि 14 अप्रैल 1891 के दिन उनके परिवार में जन्म लेने वाला भीम एक दिन महामानव, महादानी और महाशक्तिमान बनेगा तथा अपनी कठोर तपस्या से दबे-कुचले, शोषित, पीड़ित व दुखियों का बुद्ध बन इनके सदियों के संताप को वरदान में बदल कर समाज की घृणित दासता और अमानुषिक अन्याय को अपने संघर्ष, दान और विवेक की लौ से जला कर राख कर देगा।

20 नवम्बर 1930 को इंगलैंड में गोलमेज कांफ्रैंस में बोलते हुए डा. अम्बेदकर ने कहा था, “भारत में अंग्रेजों की अफसरशाही सरकार दलितों का कल्याण न कर सकी इसलिए हम महसूस करते हैं कि हमारे दुखों का निपटारा हम खुद ही बढिय़ा तरीके से कर सकते हैं और हम यह काम उस वक्त तक नहीं कर सकते जब तक राजनीतिक शक्ति हमारे हाथ में नहीं आ जाती। राजनीतिक भागीदारी हमें तब तक नहीं मिल सकती जब तक अंग्रेज सरकार को हटाया नहीं जाता तथा राजनीतिक सत्ता हमारे हाथों में आने का अवसर केवल लोगों की सरकार तथा स्वराज के संविधान द्वारा ही मिल सकता है और हम अपने लोगों का कल्याण भी इसी प्रकार कर सकते हैं और हम ऐसी कोई भी सरकार नहीं चाहते जिसका अर्थ केवल यह निकले कि हमने केवल अपने शासक ही बदले हैं।”

आपने मराठी साप्ताहिक ‘मूक नायक’, ‘बहिष्कृत भारत’, ‘साप्ताहिक जनता’ व ‘प्रबुद्ध भारत’ आदि पत्रों का प्रकाशन किया। जिनका मुख्य लक्ष्य दलित समाज व कमजोर वर्ग के दुखों, मुसीबतों, कठिनाइयों, समस्याओं व उनकी जरूरतों को अंधी, गूंगी व बहरी, गोरी सरकार के सामने लाना था।

डा. अम्बेदकर कुछ समय के लिए महाराजा बड़ौदा के सैनिक सचिव व बम्बई सिडनम कालेज में राजनीति तथा अर्थशास्त्र के प्रोफैसर रहे। बाद में जून 1928 में ला कालेज में प्रोफैसर नियुक्त हुए लेकिन आपका असली उद्देश्य पिछड़े व दलित लोगों की बेहतरी के लिए काम करना था। इन्होंने 1937 में लेबर पार्टी और अप्रैल 1942 में शैड्यूल्ड कास्ट फैडरेशन, होस्टल तथा कई कालेजों व विश्वविद्यालयों की स्थापना की।

भारत रत्न डा. भीम राव अम्बेदकर सिर्फ संविधान निर्माता ही नहीं बल्कि एक सच्चे देश भक्त, दलितों व पिछड़ों के मसीहा, कमजोरों के रहबर, उच्चकोटि के विद्वान, महान दार्शनिक होने के  साथ-साथ निर्भीक पत्रकार, लेखक व प्रसिद्ध समाज सुधारक थे।

उन्होंने अपना पूरा जीवन जात-पात, ऊंच-नीच, छुआछूत, असमानता जैसी प्रचलित सामाजिक व्यवस्था खत्म करने में लगा दिया। करोड़ों दलितों व पिछड़े लोगों की नर्क व जिल्लत भरी जिंदगी को जड़ से उखाड़ फैंक कर उन्हें समानता की कतार में लाकर खड़ा कर देना किसी साधारण व्यक्ति का नहीं महान योद्धा का ही काम हो सकता है।

~ राजेन्द्र अटवाल

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