हम 'बात' कैसे कर पाते हैं: How are we able to talk?

हम ‘बात’ कैसे कर पाते हैं: How are we able to talk?

हम ‘बात’ कैसे कर पाते हैं: How are we able to talk? हम दिन भर में न जाने कितनी बातें करते हैं परंतु वे किसी को तभी समझ में आती हैं जब हम अपने फेफड़ों से आने वाली हवा, आवाज, होंठों तथा जीभ की गतिविधियों को अपने नियंत्रण में रख कर अलग-अलग शब्द तथा आवाज निकालते हैं।

हम ‘बात’ कैसे कर पाते हैं

बातें करने के लिए शरीर के जिन तीन प्रमुख हिस्सों का उपयोग हम करते हैं, वे हैं – फेफड़े (हवा के लिए), हमारे गले में मौजूद स्वररज्जु (आवाज निकालने के लिए) और जीभ, होंठ व जबड़े (स्वरों का निर्माण करने के लिए)।

परंतु क्या आपने इस बात पर भी ध्यान दिया है कि हमारे मुंह से शब्द किस तरह निकलते हैं?

दरअसल, बोलने की शुरूआत दिमाग में सोचने से होती है जो मुंह से शब्दों के रूप में बाहर आते हैं।

बोलने की प्रक्रिया में फेफड़ों से आने वाली हवा गले में मौजूद स्वररज्जु से होते हुए मुंह से निकलती है।

अलग-अलग तरह की आवाजें तथा शब्द निकालने के लिए हम जीभ, ऊपरी तथा निचले होंठों, ऊपरी तथा निचले दांतों और मुंह के ऊपरी हिस्से की मदद लेते हैं।

इन सभी को अलग-अलग आकार देकर या एक-दूसरे से विशेष ढंग से छूने पर विभिन्न प्रकार की आवाजें तथा शब्द पैदा किए जा सकते हैं।

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