हृदय रोगों में आहार की भूमिका – दय मानव शरीर का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है। यह एक अत्यन्त बलशाली पंप के समान है, जो जन्म से मृत्यु तक बिना एक क्षण का भी विश्राम लिए निरंतर क्रियाशील रहता है। सारे शरीर से दूषित रक्त खींचकर फेफड़ों में भेजना तथा फेफड़ों में रक्त के शुद्धिकरण के बाद फेफड़ों से शुद्ध रक्त लाकर धमनियों के माध्यम से शरीर की एक-एक कोशिका तक पहुँचाना ही इसका कार्य है। गलत आहार-विहार, अत्यधिक कार्य से हृदय कमजोर व रोगी बन जाता है। एक हृदय रोगी का आहार कैसा हो, यही इस लेख का विषय है।
हृदय रोगों में आहार की भूमिका
हृदय रोग का सबसे सामान्य व प्रमुख कारण है – हृदय को पोषण देने वाली कोरोनरी धमनियों में विजातीय द्रव्यों का जमाव होना, जिससे हृदय की माँसपेशियों को पोषण नहीं मिलता और हृदय कमजोर हो जाता है। यह ब्लॉकेज 20 वर्ष की आयु से प्रारंभ होकर धीरे-धीरे 60-70 की आयु होते-होते 70 से 80% तक पहुँच जाती है और तब हमें पता चलता है कि हम हृदय रोगी बन चुके हैं। यह ब्लॉकेज फैट या वसा की होती है। उसके अधिक बढ़ जाने पर रक्तवाहिनी में रक्त का दबाव बढ़ने से कभी-कभी वहाँ की मैम्बरेन (कोशिका) फट जाती है और उसके अन्दर से एक कैमिकल निकल कर खून का थक्का (Clot) बना देता है। यह क्लॉट धीरे-धीरे बड़ा हो जाता है और कोरोनरी धमनी को अवरुद्ध कर हार्ट अटैक का कारण बन जाता है। रक्त वाहिनियों में जमने वाली चर्बी के दो रूप हैं। एक (LDL) खराब कोलेस्ट्रॉल और दूसरा ट्राइग्लिसरायड। हमारे शरीर को लगभग 10 मिलीग्राम कोलेस्ट्रॉल की नित्य जरूरत होती है और इसका स्तर 100 mg/dl से कम रहना चाहिए। शरीर में ट्राइग्लिसरायड का स्तर 150 mg/dl से कम रहना चाहिए। एनीमल फैट (पशु वसा) से कोलेस्ट्रॉल तथा सभी प्रकार के तेलों से ट्राइग्लिसरायड बढ़ता है। चिकन और मटन से मछली कम नुकसानदेह है और बिना जर्दी का अंडा उससे कम। दूध भी एनीमल फैट में आता है। इसलिए स्किम्ड (skimmed) मिल्क का प्रयोग करना चाहिए। दूध को उबाल कर ठंडा होने दें। मलाई ऊपर जम जाती है, उसे उतार लें। इसी प्रकार, 2 बार और मलाई अलग कर दें। इस दूध में .2 से .4% वसा रह जाती है। बाजार के डबल टोंड दूध में 3% फैट रहता है।

सभी प्रकार के तेलों में तलकर बनाए जाने वाले खाद्य पदार्थ, जैसे पूरी, भठूरे, पकौड़े, मट्ठी, कचौरी, समोसे, सभी प्रकार के नमकीन और अधिकतर मिठाइयाँ भी तलकर बनाई जाती हैं। इनसे रक्त में ट्राइग्लिसरायड की मात्रा बढ़ती है। बाजार में तो एक बार कड़ाही में तेल डालकर उसी में बार-बार तलते रहते हैं, जिससे वह ट्रांस फैट में बदल जाता है और शरीर के लिए बहुत नुकसानदायक होता है। कई बार हम सेचुरेटिड फैट, मोनो-सेचुरेटिड फैट और पॉली सेचुरेटिड फैट के भ्रामक प्रचार के शिकार हो जाते हैं। इन तीनों में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। सभी प्रकार के नट्स, लगभग सारे सूखे मेवों में भी काफी मात्रा में वसा होती है। इसलिए हृदय रोगियों को बहुत कम मात्रा में इनका प्रयोग करना चाहिए। आजकल जीरो ऑयल कुकिंग का भी प्रचलन हो रहा है। हृदय रोगी इस विधि को भी अपना सकते हैं। शुद्ध तेल के मुकाबले रिफाइंड व डबल रिफाइंड तेल अधिक हानिकारक है क्योंकि इनमें कई प्रकार के अकार्बनिक रसायन (inorganic chemicals) मिले होते हैं।
मोटापा हृदय रोग का एक प्रमुख कारण है। इससे रक्त को शरीर में पंप करने में हृदय पर काम का बोझ बढ़ता है। रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है। मोटापा उच्च रक्तचाप का कारण है। इससे मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है। फालतू चर्बी रक्तवाहिनियों में जमा होती रहती है। इनसे हृदय रोग का खतरा बढ़ता है। इसलिए हृदय रोगियों को भोजन में मीठा, अनाज और वसा की मात्रा घटाकर अपने वजन को नियंत्रण में रखना चाहिए।

हृदय रोगियों के लिए हितकारी आहार
- घर का बना शुद्ध आहार लें। बाजार का खाना कम से कम खाएँ।
- वसा रहित दूध (skimmed milk), सोया दूध, चावल का दूध, जई का दूध और उनसे बनी दही, छाछ, पनीर आदि का प्रयोग करें, वह भी सीमित मात्रा में।
- चीनी के स्थान पर बिना मसाले वाला गुड़, शहद, खजूर, किशमिश, देसी खाँड का कम मात्रा में प्रयोग करें।
- गेहूँ, चना, जौ, बाजरा, रागी आदि के मिक्स आटे की चपाती खाएँ।
- दलिया, खिचड़ी, मूँग दाल चीला, सूजी का उपमा, पोहा, इडली, ओट्स आदि में भरपूर मात्रा में सब्जियाँ मिलाकर नाश्ते में खाएँ।
- दालों में मूँग, मसूर, चना, अरहर व लोबिया का प्रयोग करें। इनमें फाइबर, प्रोटीन, एंटीऑक्सीडेंट, आयरन, पोटेशियम, मैग्नीशियम आदि होते हैं।
- गाय का घी, सनफ्लावर, ऑलिव ऑयल, अलसी या नारियल तेल का कम से कम मात्रा में प्रयोग करें। पूरे दिन में 15 से 20 ग्राम।
- नमक का कम से कम प्रयोग करें। पूरे दिन में 2 से 2.5 ग्राम। बाजार के नमकीन बिल्कुल न खाएँ। तले हुए नमकीन, सूखे मेवे तथा बीज प्रयोग न करें।
- भिगोए हुए बादाम, अखरोट, अंजीर, किशमिश तथा सीड्स कम मात्रा में खा सकते हैं।
- भोजन में फल और सब्जियों का अधिकाधिक इस्तेमाल करें। इनमें फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन और मिनरल्स (कैल्शियम, पोटाशियम, जिंक, मैग्नीशियम, कॉपर, सिलेनियम, फॉस्फोरस, क्रोमियम, कोबाल्ट आदि) होते हैं, जो हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति (इम्यूनिटी) को बढ़ाते हैं। इनको जूस, सूप, सब्जी तथा सलाद के रूप में खाएँ। फलों को सीधे ही छीलकर, काटकर खाएँ।
- हृदय रोगियों के लिए निम्न 8 पेय बहुत लाभदायक हैं – (1) भारतीय योग संस्थान का अमृतपेय (26 जड़ी-बूटी वाली चाय)। (2) अर्जुन छाल की चाय। (3) अदरक की चाय। (4) चुकन्दर का जूस, (5) आँवले का जूस, (6) ग्रीन टी, (7) गाजर का जूस, (8) गुड़हल (Hibiscus) का जूस।
- मसालों में थोड़ी मात्रा में जीरा, धनिया, हल्दी, मेथीदाना, दालचीनी, सौंफ, काली मिर्च, इलायची, अजवायन का प्रयोग करें।
- गहरे हरे रंग की सब्जियाँ-पालक, गोभी, मेथी, ब्रोकली, बंदगोभी, सलाद पत्ते खाएँ।
- अंकुरित मूँग, काले चने, लोबिया आदि चबा-चबा कर खाएँ।
- फलों में विशेषकर सेब, पपीता, नाशपाती, अनार, आलूबुखारा, रसभरी, केला, काला अंगूर, खुबानी, संतरा, मौसम्मी, ब्लैकबेरी आदि लें।
- हृदय रोगियों के लिए लहसुन लाभदायक है।
- पैकेज्ड फूड, डिब्बा बंद फूड, प्रोसेस्ड फूड, तले-भुने मसालेदार फूड, जंक फूड, फास्ट फूड, कोल्ड ड्रिंक, बेवरेजिज, कार्बोनेटिड जूस, स्क्वैश, जैम, अल्कोहल (शराब), बाजार के डेयरी उत्पाद, बेकरी उत्पाद, सॉस, अचार, चाय, कॉफी, चॉकलेट, चाऊमिन, पिज्जा, बर्गर आदि का बिल्कुल प्रयोग न करें। इन सबमें नमक, शुगर, कैमिकल, तेल व कैलोरीज बहुत अधिक होते हैं, जो हृदय रोगी के लिए हानिकारक हैं।
- धूम्रपान से रक्त में निकोटिन व कार्बन मोनोऑक्साइड मिलता रहता है और रक्त नलिकाओं की भीतरी दीवारों को क्षतिग्रस्त करता है, जिससे हृदय रोगों को बढ़ावा मिलता है। धूम्रपान बिल्कुल न करें।
इस प्रकार भोजन के नियंत्रण के साथ-साथ नियमित योग-साधना, जिसमें हल्के आसन व व्यायाम, प्राणायाम, शवासन, ध्यान, योगनिद्रा आदि का अभ्यास अति आवश्यक है। उचित नींद लेना, अधिक शारीरिक परिश्रम से बचना, सत्संग आदि से अधिक जुड़े रहना। ये सब एक हृदय रोगी को सहज, स्वस्थ जीवन जीने में सहायक हैं।
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