Pratyahar

प्रत्याहार: व्याख्या, अष्टांग योग, प्रत्याहार के प्रकार व साधना के सूत्र

प्रत्याहार दो शब्दों से मिल कर बना है, प्रति + आहार। जैसे घात-प्रतिघात, ध्वनि-प्रतिध्वनि अर्थात्‌ विपरीत या उल्टा। ऐसे ही प्रत्याहार का अर्थ है विपरीत आहार। महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन में योग के आठ अंग बतलाए हैं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इनमें प्रत्याहार पाँचवें स्थान पर है। पतंजलि दर्शन, योग की क्रमवार साधना है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम बहिरंग योग कहाता है तथा धारणा, ध्यान, समाधि अंतरंग योग या सूक्ष्म योग कहलाता है। अंतरंग और बहिरंग साधना के बीच में एक नदी पड़ती है, जिसको पार करना अत्यंत आवश्यक है। यद्यपि बहिरंग साधना के परिपक्व होते-होते साधक इस नदी को पार करने की पात्रता कुछ हद तक हासिल कर लेता है, परन्तु फिर भी नदी पर एक पुल की आवश्यकता होती है और उस पुल का नाम “प्रत्याहार” है।

प्रत्याहार क्या है?

  • बहिरंग व अंतरंग साधना के बीच का सेतु
  • इन्द्रियों का अंतर्मुखी होना
  • वैराग्य (non-attachment)
  • सात्विक त्याग की वृत्ति
  • बहिरगामी ऊर्जा का अंतःगामी बहाव
  • जीवन में निष्पक्षता का भाव
  • आदतों के बंधन से मुक्ति
  • ममत्व ओर मोह का त्याग

आइये प्रत्याहार को अलग-अलग प्रकार से समझते हैं।

मेरा शरीर, मेरा मन, मेरी इन्द्रियाँ, मेरी बुद्धि व चित्त यानि कि स्थूल, सूक्ष्म व कारण-तीनों ही शरीर इस संसार के विषयों, संसार की चकाचौंध, राग-द्वेष,हिंसा-घणा, कलह-क्लेश, मोह-ममता आदि में रमे हुए हैं। तो कैसे इन तीनों शरीरों को बुराइयों से हटाकर अच्छाई, परोपकार व परमार्थ की ओर लगाएँ-बस, इसको सिद्ध क्ष्ने के लिए जो साधन अपनाया जाता है, वही प्रत्याहार है।

प्रत्याहार को एक और परिप्रेक्ष्य में समझते हैं। हमारे पूर्वजों ने मानव जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास | ब्रह्मचर्य आश्रम में स्वास्थ्य, शिक्षा, ज्ञान तथा धर्म को जानने का पुरुषार्थ। गृहस्थाश्रम में नीति-पूर्वक कामनाओं तथा वासनाओं की पूर्ति (धन, मकान, दुकान, व्यापार, शादी-विवाह, यश, कीर्ति आदि)। वानप्रस्थ आश्रम में मानव जीवन की सार्थकता के लिए चारों ओर फेली हुई वृत्तियों को धीरे-धीरे पुनः वापस समेटना। गीता में भगवान अर्जुन को बताते हैं-“जिस भाँति से कछुआ समेटे, अंग चारों छोर से। दृढ़प्रतिज्ञ जब यों इंद्रियां, सिमटे विषयों की ओर से”। संन्यास आश्रम में अपने व अपनों के स्वार्थ को छोडकर केवल दूसरों के कल्याण के लिए, समाज के लिए जीना। जीवन का प्रत्येक कर्म अकर्ता-अभोक्ता भाव से करना। निष्काम भाव के साथ जीना। जीओ और जीने दो को सार्थक करना।

इन चार आश्रमों में वानप्रस्थ आश्रम “प्रत्याहार कहलाता है। वानप्रस्थ में साधक को क्या करना होता है? जो आँखें बाहर के दृश्यों को देखते-देखते आज तक तृप्त नहीं हुईं, अब उन्हें भीतर के संसार को देखने की आदत डालना। जो जीभ स्वादिष्ट भोजनों का रस लेते-लेते तृप्त नहीं हुई, अब उसे बेस्वाद भोजन में भो रस लेना सिखाना। जो जीभ दूसरों की निंदा / चुगली में ही रमी रही, जो कान इसी में सुख लेते रहे, अब उन्हें भगवान के कीर्तन, भजन, सत्संग व अच्छी बातों में लगाना। जो आनंद विषयों को भोगने में आता रहा, अब उसे पर-सेवा और कर-सेवा की ओर मोडना। इसे वैराग्य कहा जाता है (Detachment) का अभ्यास।

महर्षि पतंजलि समाधिपाद के 12वें सूत्र में बताते हैं – “अभ्यास वैराग्याभ्याम्‌ तन्निरोध:“। गीता में भगवान श्रीकृष्ण भी बताते हैं – “अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण गृह्मते।” वैराग्य का अर्थ है हम इन्द्रियों के दास बनकर न जियें। AC मिला तो AC में सो जाएँ और न मिले तो बिना उसके भी नींद आ जाए। बँधें नहीं। आदतों के बंधन को धीरे-धीरे दूर करना ही “प्रत्याहार” की साधना है। धीरे-धीरे पति, पत्नी, बच्चे, मकान, दुकान, धन, दौलत, ममता, अहंकार के प्रति वैराग्य (Detachment) का भाव बनाएँ। धोरे-धीरे अपने भीतर त्याग का भाव विकसित करें। प्रश्न है ये सब कैसे होगा? रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द रूपी जो पाँच वृत्तियाँ हैं, वे हमारे मन-मस्तिष्क पर इस कदर हावी हैं कि हमारी इन्द्रियों को अंतर्मुखी होने ही नहीं देतीं। धीरे-धीरे इनके आहार का रूप बदला जाता है। समाधिपाद के 35वें सूत्र में पतंजलि जी कहते हैं – “विषयवती वा प्रवृत्तिरत्पनन मनसा स्थिति निबन्धिनी” यही प्रत्याहार की साधना है। जब नासाग्र पर चेतना को स्थिर करके स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास को देखने का दीर्घकालिक अनुष्ठान किया जाता है तो एक दिव्य गंध की अनुभूति होती है, जिसके आगे सारी सांसारिक गंध (इत्र, Scent आदि) फीकी पड़ जाती हैं। इस प्रकार, निम्नकोटि की विषयी वृत्तियाँ जब साधना के द्वारा उच्च कोटि की दिव्य प्रवृत्तियाँ बन जाती हैं तो हमारी आध्यात्मिक साधना में सहायक बन जाती हैं। इसी प्रकार, जिह्ना के अग्रभाग पर अनुष्ठान से दिव्य रस की अनुभूति, जिह्ना के मध्य भाग पर अनुष्ठान से दिव्य स्पर्श की अनुभूति, तालु पर अनुष्ठान से दिव्य रूप की अनुभूति तथा जिह्ना मूल पर अनुष्ठान करने से दिव्य शब्द, अनहद नाद की अनभति होती है।

अपने भीतर सांसारिक वस्तुओं और विषयों के प्रति त्याग की प्रकृति विकसित करना भी प्रत्याहार की साधना है। यह संतोष अपनाने से संभव होता है। महर्षि पतंजलि जी ने संतोष को परम सुख बतलाया है – “संतोषाद अनुत्तम॑ सुख लाभ:“। त्याग से मिलने वाला सुख संग्रह के मुकाबले बड़ा होता है। बहुत धनलाभ होने पर भी वह सुख प्राप्त नहीं होता, जो किसी वास्तविक जरूरतमंद को थोड़ा-सा धन दे देने पर प्राप्त होता है। ईशोपनिषद का प्रथम श्लोक शिक्षा देता है – “तेनत्यक्तेन भुंजिथा” अर्थात्‌ त्यागपूर्वक भोग करो। यही प्रत्याहार की साधना है। कवि ने बहुत सुंदर लिखा-“खाओ-पियो-छको मत। चलो-फिरो-थको मत। देखो-भालो-तको मत। बोलो-चालो-बको मत। अपने लिए जीए तो क्या जीए, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए।”

महर्षि पतंजलि साधनपाद के 54वें सूत्र में बताते हैं – “स्वविषया सम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां ग्रत्याहार:” अर्थात्‌ साधनाकाल में साधक इन्द्रियों के विषयों को त्याग करके अपने चित्त को ध्येय में लगाता है। उस समय इन्द्रियों का अपने विषयों की ओर न जाकर चित्त में विलीन-सा हो जाना प्रत्याहार है और प्रत्याहार सिद्ध हो जाने पर साधक की इन्द्रियाँ पूरी तरह उसके वशीभृत हो जाती हैं। “तत: परमावश्यत इन्द्रियाणाम्‌।”

प्रत्याहार की साधना के सूत्र:

आत्म-चिंतन, आत्म-निरीक्षण, योग निद्रा, त्राटक होश-पूर्वक जीना (Consciousness) | हल्का, सादा, सरल, सुपाच्य व अपनी प्रकृति के अनुसार ठीक समय पर, ठीक मात्रा में, ठीक गुणवत्ता वाला भोजन। गलत आदतों, गलत स्वभाव को त्याग कर अच्छी आदतों को अपनाना। आदतों को बदलना असम्भव-सा लगता हैं। इसके लिए अच्छी बातों से जुड़ते जाएँ, गलत स्वयं ही छुटती जाएँगी।

  • अहिंसा: हाथ, पर, जीभ और मन का प्रत्याहार है।
  • सत्य: जिह्म और वाणी का प्रत्याहार है।
  • अस्तेय: मन का प्रत्याहार हे।
  • ब्रह्मचर्य: कामेन्द्रियों का प्रत्यहा।९ हे।
  • अपरिग्रह: मन का प्रत्याहार है।
  • शौच: आंतरिक तथा बाह्य शरीर का प्रत्याहार है।
  • संतोष: चित्त व अंतःकरण का प्रत्याहार हे।
  • तप: शरीर का प्रत्याहार है।
  • स्वाध्याय: बुद्धि का प्रत्याहार है।
  • ईश्वर प्रणिधान: सूक्ष्म व कारण शरीर का प्रत्याहार है।

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