Home » Veerbala Bhavsar

Veerbala Bhavsar

डॉ. वीरबाला भावसार (अक्टूबर 1931 – अगस्त 2010) स्वतंत्र्ता से पूर्व जन्मे रचनाकारों की उस पीढी से है, जिन्होंने प्रयोगवाद व प्रगतिवाद के दौर में अपनी रचना-यात्र प्रारम्भ की तथा आधुनिक मुक्त छंद की कविता तक विभिन्न सोपान से गुजरते हुए कविता कामिनी के सुकुमार स्वरूप को बनाए रखा। छायावादियों की तरह का एक रूमानी संसार कविता म बसाए रखना, इस प्रकार के रचनाकारों की विशिष्टता है। इस दौर में हिन्दी साहित्य में कई बडे रचनाकारों ने गद्य गीतों की रचना की। डॉ. वीरबाला भावसार द्वारा रचित इस संकलन की कुछ कविताओं यथा ‘भोर हुई है’, ‘मैं निद्रा में थी’, ‘वैरागिनी’, ‘तुलिका हूँ’ तथा ‘बाती जलती है’ आदि को गद्य गीत या गद्य काव्य की श्रेणी में रखा जा सकता है।

श्वेत कबूतर: अचानक मिलने वाली खुशी पर कविता

श्वेत कबूतर: वीरबाला भावसार

श्वेत कबूतर: डॉ. वीरबाला It happens some times. We get suddenly and without expecting, some thing that we had longed for a long long time. Heart is thrilled, and it sings, and dances! Coming of a white pigeon is a metaphor of such a rare thrill. मेरे आंगन श्वेत कबूतर! उड़ आया ऊंची मुंडेर से, मेरे आंगन श्वेत कबूतर! गर्मी …

Read More »

नाव चलती रही – वीरबाला भावसार

नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही। कौन सी रागनी बज रही है यहां देह से अजनबी प्राण से अजनबी क्या अजनबी रागनी के लिये जिंदगी की त्वरा यूँ मचलती रही नाव चलती रही, सांझ ढलती रही, उम्र लहरों सी तट पर बिछलती रही। रुक गए यूँ कदम मुद के देखूं जरा है वहां …

Read More »

मन पाखी टेरा रे – वीरबाला भावसार

रुक रुक चले बयार, कि झुक झुक जाए बादल छाँह कोई मन सावन घेरा रे, कोई मन सावन घेरा रे ये बगुलों की पांत उडी मन के गोले आकाश कोई मन पाखी टेरा रे कोई मन पाखी टेरा रे कौंध कौंध कर चली बिजुरिया, बदल को समझने बीच डगर मत छेड़ लगी है, पूर्व हाय लजाने सहमे सकुचे पांव, कि …

Read More »

मन ऐसा अकुलाया – वीरबाला भावसार

एक चिरैया बोले, हौले आँगन डोले मन ऐसा अकुलाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया। चन्दन धुप लिपा दरवाज़ा, चौक पूरी अँगनाई बड़े सवेरे कोयल कुहुकी, गूंज उठी शहनाई भोर किरण क्या फूटी, मेरी निंदिया टूटी मन ऐसा अकुलाया, रह रह ध्यान तुम्हारा आया। झर झर पात जहर रहे मन के, एकदम सूना सूना कह तो देती मन ही पर, दुःख …

Read More »

फूल और मिट्टी – वीरबाला भावसार

मिट्टी को देख फूल हँस पड़ा मस्ती से लहरा कर पंखुरियाँ बोला वह मिट्टी से– उफ मिट्टी! पैरों के नीचे प्रतिक्षण रौंदी जा कर भी कैसे होता है संतोष तुम्हें? उफ मिट्टी! मैं तो यह सोच भी नहीं सकता हूं क्षणभर‚ स्वर में कुछ और अधिक बेचैनी बढ़ आई‚ ऊंचा उठ कर कुछ मृदु–पवन झकोरों में उत्तेजित स्वर में‚ वह …

Read More »

नींद की पुकार – वीरबाला भावसार

नींद बड़ी गहरी थी, झटके से टूट गई तुमने पुकारा, या द्वार आकर लौट गए। बार बार आई मैं, द्वार तक न पाया कुछ बार बार सोई पर, स्वप्न भी न आया कुछ अनसूया अनजागा, हर क्षण तुमको सौंपा तुमने स्वीकारा, या द्वार आकर लौट गए। चुप भी मैं रह न सकी, कुछ भी मैं कह न सकी जीवन की …

Read More »

है मन का तीर्थ बहुत गहरा – वीरबाला भावसार

है मन का तीर्थ बहुत गहरा। हंसना‚ गाना‚ होना उदास‚ ये मापक हैं न कभी मन की गहराई के। इनके नीचे‚ नीचे‚ नीचे‚ है कुछ ऐसा‚ जो हरदम भटका करता है। हंसते हंसते‚ बातें करते‚ एक बहुत उदास थकी सी जो निश्वास‚ निकल ही जाती है‚ मन की भोली गौरैया को जो कसे हुए है भारी भयावना अजगर‚ ये सांस …

Read More »