कपालभाति प्राणायाम से मस्तिष्क में चमक पैदा होती है अर्थात् मस्तिष्क की शुद्धि होती है। इसलिए इसे कपालभाति प्राणायाम कहते हैं।
कपालभाति प्राणायाम: सावधानी
उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, वर्टिंगो, पेट में अल्सर का फोड़ा होना तथा मूर्च्छा के रोगी इस प्राणायाम का अभ्यास न करें।
विधि:
पद्मासन या ध्यान के किसी अन्य आसन में बैठें। दोनों हथेलियों को घुटनों पर चिन्मुद्रा में रखें। कमर व गर्दन को सीधा करें। आँखों को कोमलता से बंद करें। चेहरे पर प्रसन्नता लाएं। श्वास को पूरा भीतर भरें। मूल बन्ध लगाएं। पेडू की माँसपेशियों का संकोचन करते हुए बारम्बार शक्ति के साथ श्वास को बाहर फेंकते जाएं। दो आवृत्तियों के मध्य स्वतः थोड़ा-सा श्वास अंदर जाएगा, जो शक्ति से श्वास को बाहर फेंकने में सहायक होगा।
अंत में अधिकतम श्वास बाहर निकालकर बाह्य कुंभक में उड्डियान बन्ध व जालंधर बन्ध भी लगाएं। यथाशक्ति बाह्य कुभक में त्रिबन्ध के साथ रुकें। धीरे-धीरे क्रमश: जालंधर, उड्डियान व मूलबंध को खोलते हुए श्वासों को सामान्य करें। आवृत्तियों को धीरे-धीरे बढ़ाते जाएं। इसे दो बार और दोहराएं।
कपालभाति प्राणायाम: लाभ
- फेफड़ों में रुकी हुई दूषित वायु बाहर निकलती है।
- जोड़ों के मध्य पाए जाने वाले तैलीय पदार्थ की गुणवत्ता व मात्रा में सुधार आता है।
- सभी प्रकार के कफ दोष, सिरदर्द, साइनसाइटिस के रोग ठीक होते हैं।
- फेफड़ों में ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता बढ़ती है।
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