श्री खुरालगढ़ साहिब, जो पंजाब के होशियारपुर जिले में शिवालिक की पहाड़ियों की गोद में खराली गांव में स्थित है, न केवल एक धार्मिक तीर्थस्थल है बल्कि स्वाभिमान, समानता और आधुनिक वास्तुकला का एक अद्भुत संगम भी है। “चरण छोह गंगा” के नाम से भी प्रसिद्ध यह स्थान संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की तपोस्थली है। हाल के वर्षों में यहां निर्मित किया जा रहा “श्री गुरु रविदास मैमोरियल” और “मीनार-ए-बेगमपुरा” ने इसे विश्वस्तरीय धार्मिक और स्थापत्य मानचित्र पर स्थापित कर दिया है।
श्री खुरालगढ़ साहिब: ऐतिहासिक महत्व
| Name: | श्री खुरालगढ़ साहिब (Shri Khuralgarh Sahib) Charan Choh Ganga |
| Location: | Kharali village, Garhshanker, Hoshiarpur district, Punjab, India |
| Deity: | Guru Ravidass |
| Affiliation: | Ad-Dharmi, Sikh Bhagats, Ravidassi, Ramdasia |
| Festivals: | Guru Ravidass Jayanti |
| Architecture: | Sikh architecture |
मान्यता है कि गुरु रविदास जी ने यहां लगभग चार वर्ष, दो महीने और ग्यारह दिन व्यतीत किए थे।
एक मान्यता के अनुसार, गुरु रविदास जी कमजोर वर्ग के लोगों के भले के लिए अपनी शिष्या मीरा बाई के कहने पर इस स्थान पर आए थे। उनके उपदेशों से बहुत सारे लोग उनके शिष्य बन गए, जिससे स्थानीय राजा परेशान हो गया। गुरु जी को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। सजा के तौर पर उन्हें चक्की में मक्की पीसने का आदेश दिया गया। गुरु जी समाधि में बैठ गए और मक्की अपने आप पिसने लगी। यह देखकर जेल के पहरेदार राजा के पास गए और बताया कि गुरु जी कोई आम इंसान नहीं हैं। बिना किसी इंसान की मदद के चक्की से मक्की निकलते देखकर राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने गुरु जी को आजाद कर दिया।

चूंकि उस इलाके में पानी की कमी थी, इसलिए राजा ने गुरु जी से उस जगह को आशीर्वाद देने का अनुरोध किया।
कहा जाता है कि गुरु जी ने सूखी नदी के किनारे एक पत्थर को अपने बाएं पैर के अंगूठे से छुआ और एक झरना फूट पड़ा, जिसे अब “चरण छोह गंगा” के नाम से जाना जाता है।
मीनार-ए-बेगमपुरा:
इस परिसर का सबसे आकर्षक और भव्य हिस्सा मीनार-ए-बेगमपुरा है। यह मीनार गुरु रविदास जी के “बेगमपुरा” (एक ऐसा शहर जहां कोई गम या भेदभाव न हो) के संकल्प को मूर्त रूप देती है। पूरी बन जाने पर यह 151 फुट ऊंची होगी। इसकी वास्तुकला में आधुनिकता और आध्यात्मिकता का मिश्रण है।
इसका डिजाइन त्रिकोणीय है, जो मन, शरीर और आत्मा के सामंजस्य को दर्शाता है।
यहां एक रास्ते को “अनंत पथ” कहा जाता है। यह पश्चिम से पूर्व की ओर जाता है, जो अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है। श्रद्धालु इस मार्ग पर चलकर आत्मिक शांति का अनुभव करते हैं।
मैमोरियल कॉम्प्लैक्स लगभग 14.4 एकड़ भूमि पर फैला हुआ है। इसकी वास्तुकला को इस तरह से तैयार किया गया है कि यह आने वाले हजारों श्रद्धालुओं की आवश्यकताओं को पूरा कर सके। इसके निर्माण में उच्च गुणवत्ता वाले पत्थरों और कंक्रीट का उपयोग किया गया है।

अन्य ऐतिहासिक स्मारक:
प्राचीन मंदिर और तपोस्थान: वह स्थान जहां गुरु जी तपस्या करते थे। मंदिर में अष्टधातु की भव्य प्रतिमा स्थापित है।
ऐतिहासिक चक्की: परिसर में वह पत्थर की चक्की आज भी सुरक्षित है, जिसे गुरु जी ने अपने प्रवास के दौरान चलाया था।
श्री खुरालगढ़ साहिब केवल ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि यह एक न्यायपूर्ण और समान समाज के सपने का गवाह है।
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