पहन कर साड़ी पीली-पीली,खेतों में इतराई सरसों।
क्यारी-क्यारी खड़ी-खड़ी,
मंद-मंद मुस्कुराई सरसों।
स्वागत में बसंत ऋतु की,
बढ़-चढ़ आगे आयी सरसों।
करके धरती माँ का श्रृंगार,
मन ही मन हर्षाई सरसों।
पुरवा पवन के झोंकों संग,
कोहरे में लहराई सरसों।
पहन कर साड़ी पीली-पीली,क्यारी-क्यारी खड़ी-खड़ी,
मंद-मंद मुस्कुराई सरसों।
स्वागत में बसंत ऋतु की,
बढ़-चढ़ आगे आयी सरसों।
करके धरती माँ का श्रृंगार,
मन ही मन हर्षाई सरसों।
पुरवा पवन के झोंकों संग,
कोहरे में लहराई सरसों।
The modern woman doesn’t need society to validate her existence. She is charting unmapped territories …