पहन कर साड़ी पीली-पीली,खेतों में इतराई सरसों।
क्यारी-क्यारी खड़ी-खड़ी,
मंद-मंद मुस्कुराई सरसों।
स्वागत में बसंत ऋतु की,
बढ़-चढ़ आगे आयी सरसों।
करके धरती माँ का श्रृंगार,
मन ही मन हर्षाई सरसों।
पुरवा पवन के झोंकों संग,
कोहरे में लहराई सरसों।
पहन कर साड़ी पीली-पीली,क्यारी-क्यारी खड़ी-खड़ी,
मंद-मंद मुस्कुराई सरसों।
स्वागत में बसंत ऋतु की,
बढ़-चढ़ आगे आयी सरसों।
करके धरती माँ का श्रृंगार,
मन ही मन हर्षाई सरसों।
पुरवा पवन के झोंकों संग,
कोहरे में लहराई सरसों।
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