प्रथम प्रणय – धर्मवीर भारती

पहला दृष्टिकोणः

यों कथा–कहानी–उपन्यास में कुछ भी हो
इस अधकचरे मन के पहले आकर्षण को
कोई भी याद नहीं रखता
चाहे मैं हूं‚ चाहे तुम हो!

कड़वा नैराश्य‚ विकलता‚ घुटती बेचैनी
धीरे–धीरे दब जाती है‚
परिवार‚ गृहस्थी‚ रोजी–धंधा‚ राजनीति
अखबार सुबह‚ संध्या को पत्नी का आँचल
मन पर छाया कर लेते हैं
जीवन की यह विराट चक्की
हर–एक नोक को घिस कर चिकना कर देती‚
कच्चे मन पर पड़नेवाली पतली रेखा
तेजी से बढ़ती हुई उम्र के
पाँवों से मिट जाती है।

यों कथा–कहानी–उपन्यास में कुछ भी हो
इस अधकचरे मन की पहली कमज़ोरी को
कोई भी याद नहीं रखता
चाहे मैं हूं‚ चाहे तुम हो!

दूसरा दृष्टिकोण

यों दुनियाँ–दिखलावे की बात भले कुछ भी हो
इस कच्चे मन के पहले आत्म–समर्पण को
कोई भी भूल नहीं पाता
चाहे मैं हूं‚ चाहे तुम हो

हर–एक काम में बेतरतीबी‚ झुंझलाहट
जल्दबाजी‚ लापरवाही
या दृष्टिकोण का रूखापन
अपने सारे पिछले जीवन
पर तीखे व्यंग वचन कहना
या छोटेमोटे बेमानी कामों में भी
आवश्यकता से कहीं अधिक उलझे रहना
या राजनीति‚ इतिहास‚ धर्म‚ दर्शन के
बड़े लबादों में मुह ढक लेना

इन सबसे केवल इतना ज़ाहिर होता है
यों दुनियाँ–दिखलावे की बात भले कुछ भी हो
इस कच्चे मन के पहले आत्म–समर्पण को
कोई भी भूल नहीं पाता
चाहे मैं हूं‚ चाहे तुम हो।

∼ धर्मवीर भारती

About Dharamvir Bharati

धर्मवीर भारती (२५ दिसंबर, १९२६- ४ सितंबर, १९९७) आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार और सामाजिक विचारक थे। वे एक समय की प्रख्यात साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के प्रधान संपादक भी थे। डॉ धर्मवीर भारती को १९७२ में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनका उपन्यास गुनाहों का देवता सदाबहार रचना मानी जाती है। सूरज का सातवां घोड़ा को कहानी कहने का अनुपम प्रयोग माना जाता है, जिस श्याम बेनेगल ने इसी नाम की फिल्म बनायी, अंधा युग उनका प्रसिद्ध नाटक है।। इब्राहीम अलकाजी, राम गोपाल बजाज, अरविन्द गौड़, रतन थियम, एम के रैना, मोहन महर्षि और कई अन्य भारतीय रंगमंच निर्देशकों ने इसका मंचन किया है।

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