कस्बे के स्टेशन की धूल भरी राह बड़ी सूनी सी
ट्रेन गुजर जाने के बाद
पके खेतों पर ख़ामोशी पहले से और हुई दूनी सी
आंधी के पत्तों से
अनगिन तोते जैसे टूट गिरे
लाइन पर, मेड़ों पर, पुलिया आस पास
सब कुछ निस्तब्ध शांत मूर्छित सा अकस्मात्…
चौकन्नी लोखरिया उछली
और तेज़ी से तार फांद लाइन कर गई क्रॉस
जैसे शीशे में चटखे दरार
सहसा मुझको यह अहसास हुआ–
यह सब है और किसी का
यह पगडंडी, यह गांव, सुग्गों के हरे पंख, गति जीवन:
सबका सब और किसी का
मेरा है केवल निर्वासन, निर्वासन, निर्वासन…
∼ धर्मवीर भारती
शब्दार्थ:
निर्वासन ∼ देश निकाला
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