Rabindranath Tagore

देश की माटी देश का जल: रबीन्द्रनाथ टैगोर

देश की माटी देश का जल
हवा देश की देश के फल
सरस बनें प्रभु सरस बने

देश के घर और देश के घाट
देश के वन और देश के बाट
सरल बनें प्रभु सरल बनें प्रभु

देश के तन और देश के मन
देश के घर के भाई-बहन
विमल बनें प्रभु विमल बनें

रबीन्द्रनाथ टैगोर

अनुवाद – भवानी प्रसाद मिश्र

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