3 दिन का शोक, घुटनों के बल बैठे CM, अंतिम यात्रा में उमड़ पड़ा असम… कहानी उस ज़ुबीन गर्ग की जिन्होंने 38000+ गानों को दी आवाज, संगीत को बनाया जीवन
जोरहाट में पले-बढ़े ज़ुबीन ने कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़कर संगीत को ही अपना जीवन बना लिया था। 1992 में उनका पहला एलबम अनामिका आया और छा गया।
गुवाहाटी ने रविवार (21 सितम्बर 2025) को ऐसा दृश्य देखा, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। हजारों-लाखों लोग एयरपोर्ट से शहर तक सड़कों के दोनों ओर खड़े रहे, बस एक अंतिम झलक पाने के लिए। वह झलक उस शख़्स की, जिसकी आवाज ने असम के हर दिल की धड़कन को सुरों से सजाया था।
प्रसिद्ध गायक, संगीतकार, अभिनेता और सांस्कृतिक प्रतीक ज़ुबीन गर्ग अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनकी पार्थिव शरीर जब गुवाहाटी पहुँचा, तो आम सी चलने वाली भीड़ एक जुलूस में बदल गई, मानो पूरा असम उनके साथ चल पड़ा हो।
52 साल के ज़ुबीन गर्ग का निधन शुक्रवार (19 सितम्बर 2025) को सिंगापुर में हुआ। वह नॉर्थ ईस्ट इंडिया फ़ेस्टिवल में भाग लेने वहाँ गए थे। शुक्रवार को यॉट पर सैर के दौरान उन्होंने पानी में तैरने के लिए लाइफ जैकेट उतारी, फिर पानी में उतरते ही उनकी तबियत बिगड़ गई और वह बेहोश हो गए। तुरंत उन्हें निकाला गया, सीपीआर दिया गया फिर अस्पताल ले जाया गया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।
असम का शोक और ठहराव:
उनकी अचानक मौत की खबर ने पूरे असम को हिला दिया। अगले ही दिन पूरा राज्य मानो ठहर गया बाजार बंद हो गए, तीन दिन का राजकीय शोक घोषित हुआ, परीक्षाएँ स्थगित कर दी गईं और जगह-जगह लोग मोमबत्तियाँ जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि देने लगे। हर गली-मोहल्ले में उनकी तस्वीर के सामने दीये जलते नजर आए। यह सिर्फ शोक नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक व्यक्तित्व के प्रति गहरी आस्था और अपनापन था।
शनिवार (20 सितम्बर 2025) को सिंगापुर में पोस्टमार्टम के बाद उनके पार्थिव शरीर को उनके मित्रों को सौंप दिया गया। दिल्ली होते हुए जब पार्थिव शरीर गुवाहाटी पहुँचा, तो मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा खुद वहाँ मौजूद थे। वो जुबीन को श्रद्धांजलि देने के लिए उनके पार्थिव शरीर के सामने घुटनों के बल बैठ गए।
योजना थी कि सुबह उनके निवास पर लाने के बाद सरसजाई स्टेडियम में रखा जाएगा ताकि लोग सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक उनका अंतिम दर्शन कर सकें। लेकिन जिस संख्या में लोग उमड़े, उसने पूरा कार्यक्रम बदल दिया। एयरपोर्ट से घर तक का सफर छह घंटे का हो गया।
भीड़ देखकर मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि लोग पूरी रात और अगले दिन भी स्टेडियम में उन्हें श्रद्धांजलि दे सकेंगे।
अंतिम संस्कार मंगलवार को होने की संभावना है और सरकार उनके लिए स्मारक स्थल तय कर रही है, जैसा कि डॉ भूपेन हजारिका के लिए किया गया था।

विनम्र शुरुआत से सांस्कृतिक शिखर तक
ज़ुबीन का जन्म 18 अप्रैल 1972 को मेघालय के तुरा में हुआ। उनका परिवार कला-संस्कृति से गहराई से जुड़ा था। उनकी माँ प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना और अभिनेत्री थीं, पिता कवि-गीतकार। बचपन से ही उन्हें संगीत की साधना मिली। तीन साल की उम्र से गाना शुरू किया, माँ पहली गुरु थीं। उन्होंने तबला से लेकर गिटार तक, एक दर्जन से अधिक वाद्ययंत्र बजाना सीखा।
जोरहाट में पले-बढ़े ज़ुबीन ने असमिया लोकगीत, बिहू और सत्रिया संगीत के साथ आधुनिक धुनों को आत्मसात किया। कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़कर उन्होंने संगीत को ही अपना जीवन बना लिया। 1992 में उनका पहला एलबम अनामिका आया और छा गया।
इसके बाद माया, आशा, रंग, मुक्ति, पाखी, शिशु, रूमाल जैसे एलबमों ने उन्हें असम का सबसे बड़ा सितारा बना दिया। उन्होंने 38 हजार से अधिक गीत गाए, असमिया, हिंदी, बांग्ला, मराठी, तमिल, तेलुगु, उड़िया, नेपाली और कई अन्य भाषाओं में।
अकेले असमिया में पाँच हजार से ज्यादा गाने गाए और लिखे। उनकी आवाज असमिया सिनेमा से लेकर बॉलीवुड तक गूँजी। गैंगस्टर के गाने ‘या अली’ ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इसके अलावा राम रे (कांटे), दिल तू ही बता (कृष 3) जैसे गीत भी लोकप्रिय हुए। लेकिन उन्हें मुंबई की चमक-दमक रास नहीं आई और वह वापस असम लौट आए।
The legend's last journey continues through the streets of Guwahati.#BelovedZubeen pic.twitter.com/3zco3uZGk0
— Himanta Biswa Sarma (@himantabiswa) September 21, 2025
सिर्फ गायक नहीं, असम की आत्मा
ज़ुबीन सिर्फ गायक नहीं थे, बल्कि असम की आत्मा थे। उन्होंने लोकगीतों और आधुनिक संगीत का ऐसा संगम किया कि एक नई शैली ने ही जन्म ले लिया। उनके गीतों में ब्रह्मपुत्र की गूंज, चाय बागानों की खुशबू और असम की जिजीविषा झलकती थी।
उनके कंसर्ट्स में लाखों की भीड़ उमड़ती थी। लोग उन्हें ज़ुबीन दा कहते, क्योंकि वह सहज, सरल और हर किसी के अपने लगते थे। मंच पर भी वह किसी रस्मी औपचारिकता में बंधे नहीं रहते थे। कभी मजाक करते, कभी गुस्सा दिखाते, कभी खुलकर पीते लोगों को यह बेबाक़ी पसंद थी। उनकी आवाज विरोध का भी स्वर बनी।
2019-20 में CAA विरोध प्रदर्शनों में उन्होंने अपने गीतों से आंदोलन को धार दी। ‘मृत्यु एटिया होहोज’ जैसे गीत ने प्रदर्शनकारियों की आँखों में आँसू ला दिए। पर्यावरण संरक्षण हो, भाषा अधिकारों की लड़ाई हो या आपदा राहत हर जगह वह आगे रहते थे।
विवाद और आलोचना भी
जहाँ लाखों लोग उन्हें पूजते थे, वहीं आलोचना भी होती थी। मंच पर शराब पीकर प्रदर्शन करना, वादों को तोड़ना, कभी-कभी अपशब्द बोलना यह सब उनकी छवि का हिस्सा था। लेकिन यही उनकी खासियत भी बनी लोगों ने उन्हें वैसे ही स्वीकार किया, जैसे वह थे।
उनकी सेहत पिछले कुछ वर्षों से बिगड़ी हुई थी। कई बार दौरे और बेहोशी की घटनाओं के कारण अस्पताल में भर्ती हुए। डॉक्टरों की सलाह के बावजूद वह खुद पर सख़्त नियंत्रण नहीं रख पाए।
यही कारण है कि उनकी मौत के बाद उनके प्रबंधक सिद्धार्थ शर्मा और आयोजनकर्ता श्यामकानु महांता पर सवाल उठ रहे हैं। प्रशंसकों ने आरोप लगाया है कि उन्होंने बीमार ज़ुबीन को थकाऊ गतिविधियों से नहीं रोका। कई जगह FIR दर्ज हुई है और अब CID जाँच कर रही है।
एक युग का अंत, लेकिन धुनें अमर
असम के लिए ज़ुबीन गर्ग का जाना वैसा ही है जैसा किसी परिवार का सिर उठ जाना। लोग मानते हैं कि उन्होंने पिछले तीन दशकों में असम को एक नई सांस्कृतिक पहचान दी। गली-गली उनके गीत गाए जाते थे, हर त्योहार और हर आंदोलन में उनकी आवाज गूँजती थी।
उनके निधन पर मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार उनके लिए स्मारक बनाएगी। लेकिन असम के लोगों के लिए असली स्मारक वह जगह नहीं होगी जहाँ उन्हें दफनाया जाएगा, बल्कि वह हर गीत होगा जो उनके होंठों से निकला और हर दिल में बस गया।
ज़ुबीन गर्ग का यह अंतिम सफर दिखा गया कि वह सिर्फ एक गायक नहीं थे, वह असम की आत्मा थे। उनका जाना एक ऐसी खाली जगह छोड़ गया है जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। लेकिन उनकी आवाज, उनकी धुनें और उनका बेबाक़ अंदाज हमेशा जिंदा रहेगा।
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