भारत द्वारा स्वतंत्रता की प्राप्ति के साथ ही एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ था कि इस विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र को किस तरह की व्यवस्था दी जाए, जो न केवल न्यायपूर्ण हो, बल्कि प्रत्येक नागरिक की आकांक्षाओं और अधिकारों का सम्मान कर सके। यही आवश्यकता भारतीय संविधान के निर्माण की प्रेरक शक्ति बनी।
संविधान दिवस: भारत की लोकतांत्रिक पहचान का ऐतिहासिक दिन
26 नवम्बर, 1949, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक स्वर्णिम दिन था, जब संविधान सभा ने भारत के संविधान को औपचारिक रूप से अंगीकार किया। यही दिन अब संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है, न केवल इस महत्वपूर्ण दस्तावेज को याद करने के लिए, बल्कि राष्ट्र की चेतना को जागृत करने के उद्देश्य से भी।

भारतीय संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह हमारे राष्ट्र के मूल्यों, भावनाओं और उम्मीदों का प्रतीक है। 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन की लंबी प्रक्रिया में यह संविधान तैयार हुआ था, जिसमें राष्ट्र की आत्मा की खोज भी निहित थी। यह संविधान दुनिया के सबसे बड़े और सबसे विस्तृत संविधानों में से एक है, जो विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक तत्वों को ध्यान में रखते हुए रचा गया।

26 जनवरी, 1950 को गणतंत्र भारत में लागू हुआ यह संविधान, भारतीय समाज की जटिलताओं और विविधताओं को समाहित करने के लिए तैयार किया गया था। इसे बनाने के लिए 389 सदस्य चुने गए थे, जिनमें से स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 299 सदस्य शेष रहे।
संविधान सभा ने 166 दिनों तक लगातार बैठकों के बाद भारतीय संविधान का मसौदा तैयार किया। संविधान सभा के प्रमुख सदस्य, जैसे डा. भीमराव आंबेडकर, पं. जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने मिलकर इस संविधान को आकार दिया। डा. भीमराव आंबेडकर को इस प्रक्रिया का प्रमुख मार्गदर्शक माना जाता है और उन्होंने संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में इस महान कार्य का नेतृत्व किया।
सभा का कार्य 9 दिसम्बर, 1946 को शुरू हुआ और 26 नवम्बर, 1949 को इसने संविधान को पारित किया। इसके बाद, 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया। भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें संविधान के निर्माण से जुड़े हर पहलू पर गहन विचार-विमर्श किया गया। इसके अंतर्गत लगभग 250 अनुच्छेद भारतीय शासन अधिनियम 1935 से लिए गए थे।
भारत का संविधान न केवल राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह नागरिकों को उनके अधिकारों का संरक्षण करने, न्याय सुनिश्चित करने और एक समतामूलक समाज की स्थापना करने की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।
संविधान के चार स्तंभ न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व-भारत को न केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में बल्कि एक जीवंत लोकतांत्रिक चेतना के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह संविधान देश की विविधताओं को अपनाने और समानता का एक सूत्र प्रदान करने में सफल हुआ है, जो अन्य देशों के लिए एक आदर्श बन गया।

सभा में 389 सदस्य थे, जिनमें से 30 से अधिक सदस्य अनुसूचित जाति और जनजातियों से थे, और संविधान के मूल में इन्हें विशेष अधिकार और प्रतिनिधित्व दिया गया।
संविधान में 395 अनुच्छेद थे, जो 22 भागों में विभाजित थे और 8 अनुसूचियां भी इसमें शामिल थीं। भारतीय संविधान का प्रस्तावना यह स्पष्ट करती है कि भारत एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य है, जो सीधे लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से शासित है।
26 नवम्बर, 2015 को, डा. भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती के अवसर पर, भारत सरकार ने संविधान दिवस को एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाना शुरू किया।
संविधान के निर्माण में कई अहम मोड़ थे, जैसे 1976 में एमरजैंसी के दौरान संविधान में ‘धर्मनिरपेक्ष‘ और ‘समाजवादी‘ शब्द जोड़े गए। इसके अलावा, भारतीय संविधान का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण यह है कि राज्य की शक्तियां केंद्रीय और राज्य सरकारों में विभाजित होती हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई भी सरकार अत्यधिक शक्तिशाली न हो।
संविधान दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारा संविधान एक जीवित दस्तावेज है, जो समय के साथ बदलती परिस्थितियों के अनुसार विकसित होता रहता है।
यह हमें अपने कर्त्तव्यों और अधिकारों की याद दिलाता है, और यह सुनिश्चित करता है कि हम एक समतामूलक और न्यायपूर्ण समाज की दिशा में निरंतर आगे बढ़ें।
26 नवम्बर को हम न केवल संविधान की श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, बल्कि यह दिन हमें एक ऐसे भारत की परिकल्पना को साकार करने का संकल्प दिलाता है, जिसमें हर नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का अनुभव हो।
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