अक्षय तृतीया का पर्व: महाभारत युद्ध की समाप्ति, बद्रीनाथ धाम के कपाट, चारधाम यात्रा

अक्षय तृतीया का पर्व: महाभारत युद्ध की समाप्ति, बद्रीनाथ धाम के कपाट, चारधाम यात्रा

क्यों मनाते हैं ‘अक्षय तृतीया’: अक्षय तृतीया का पावन पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। त्रेता और सतयुग का आरम्भ भी इसी तिथि को हुआ था इसलिए इसे कृतयुगादि तृतीया भी कहते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार इस दिन स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, तर्पण आदि जो भी कर्म किए जाते हैं, वे सब अक्षय हो जाते हैं। यह तिथि सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाली एवं सभी सुखों को प्रदान करने वाली मानी गई है।

इस तिथि की अधिष्ठात्री देवी पार्वती हैं। तृतीया तिथि को पार्वती जी ने अमोघ फल देने के सामर्थ्य का आशीर्वाद दिया था इस आशीर्वाद के प्रभाव से इस तिथि को किया गया कोई भी कार्य निष्फल नहीं होता। इस दिन से जुड़ी अनेक पौराणिक घटनाएं इस पर्व के महत्व को और भी विशेष बनाती हैं।

महाभारत युद्ध की समाप्ति का दिन

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत का भीषण युद्ध अक्षय तृतीया के दिन समाप्त हुआ था। यह दिन धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक माना जाता है इसलिए यह तिथि जीवन में सत्य, धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की परम्परा

उत्तराखंड में स्थित प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनाथ धाम के कपाट अक्षय तृतीया के दिन ही खोले जाते हैं। शीतकाल में बंद रहने वाले मंदिर के द्वार इस शुभ तिथि पर पुनः खुलते हैं, जिससे चारधाम यात्रा का आरंभ होता है।

बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की परम्परा
बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की परम्परा

चारधाम यात्रा का शुभारंभ

अक्षय तृतीया के दिन से ही चारधाम यात्रा का शुभारंभ माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन से अपनी धार्मिक यात्रा की शुरुआत करते हैं। यह दिन यात्रा, नए कार्यों और शुभ शुरुआत के लिए अत्यंत मंगलकारी माना गया है।

चारधाम यात्रा का शुभारंभ
चारधाम यात्रा का शुभारंभ

भगवान विष्णु के अवतारों का अवतरण

अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु के कई महत्वपूर्ण अवतारों का प्राकट्य हुआ था। नर-नारायण, हयग्रीव और भगवान परशुराम का अवतरण इसी तिथि को हुआ माना जाता है। विशेष रूप से भगवान परशुराम के जन्म के कारण इस दिन परशुराम जयंती भी मनाई जाती है।

ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का प्राकट्य

ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म भी इसी दिन हुआ था। ‘अक्षय’ शब्द स्वयं इस दिन के महत्व को दर्शाता है, जो अनंत और अविनाशी फल का प्रतीक है।

श्री बांके बिहारी मंदिर में चरण दर्शन का महत्व

वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मंदिर में वर्ष भर  भगवान के चरण वस्त्रों से ढके रहते हैं, लेकिन अक्षय तृतीया के दिन भक्तों को चरण दर्शन का विशेष अवसर मिलता है। यह दर्शन अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायी माना जाता है, जिसके लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

बिना ‘बजट’ बिगाड़े करें खरीदारी

अक्षय तृतीया को अबूझ मुहूर्त के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यापार शुरू करना, सोना-चांदी खरीदना या निवेश करना बेहद शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है, उसका फल कभी खत्म नहीं होता और बढ़ता ही रहता है।

इसी वजह से लोग इस दिन सोना खरीदते हैं, लेकिन हर किसी के लिए सोना लेना आसान नहीं होता है। आप बिना ज्यादा खर्च भी इस दिन को खास बना सकते हैं। कुछ सस्ती और रोजमर्रा की चीजें खरीदना भी उतना ही शुभ माना जाता है। मिट्टी का घड़ा, दीया या गमला खरीदना अच्छा माना जाता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और शांति बनी रहती है। तांबा भी शुभ ध्ातु माना जाता है। इस दिन तांबे का लोटा या बर्तन खरीदना घर के लिए अच्छा होता है। हल्दी और चावल पूजा में काम आते हैं और इन्हें शुभता का प्रतीक माना जाता है।

इस दिन इन्हें खरीदना और घर लाना अच्छा होता है। अक्षय तृतीया पर साबुत धनिया खरीदना भी बहुत शुभ माना जाता है। इसे धन और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है।

लाल कपड़ा और रूई भी पूजा में उपयोगी होती है। इन्हें खरीदना भी शुभ फल देने वाला माना जाता है। अगर आप कुछ खरीद नहीं पा रहे हैं, तो इस दिन जरूरतमंदों को दान करना भी उतना ही अच्छा माना जाता है। इससे मन को सुकून मिलता है और घर में सकारात्मक माहौल बना रहता है।

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