वह अल्लाह में विश्वास तो करता था, लेकिन नमाज नही पढ़ता था। धार्मिक मेलों में भी बहुत काम शिरकत करता था। वह काम से आकर घर खाना खाता और घर से निकल जाता।
मोहल्ले में एक जगह थी जहाँ लड़के इकट्ठे होते थे। मिलकर सब गपियाते और इधर – उधर की बातें करते थे। कभी – कभी काम – धंधे की बातें भी होती। काजी का वह लड़का भी इन लड़कों के साथ बैठता था। और जब सब लड़के अपने – अपने घर चल देते थे, तो वह भी अपने घर चला जाता था।
मोहर्रम के दिन चल रहे थे। इन दिनों लड़कों की महफ़िल दिन में भी लग रही थी। उस महफ़िल के लड़के नमाज पढ़ते थे तथा रोजे रख रहे थे। वे सब जानते थे की काजी का लड़का नमाज नही पढ़ता है। इसलिए एक दिन लड़कों ने उस लड़के ने कहा कि आज हम लोगों के साथ नमाज पढ़ने चल। उसने बहुत मना किया लेकिन अंत में राजी हो गया। उसने सोचा, चलो एक दिन नमाज पढ़ लेते हैं। यह सोचलर वह लड़कों के साथ नमाज पढ़ने चल दिया।
नवाज पढ़ने कि खबर उसके घरवालों को मिली। घरवालों को बड़ा अचरज हुआ और वे खुश भी हुए। सोचा – चलो एक नेक काम तो किया आज। हालाँकि लड़कों के कहे पर काजी के परिवार अवालों को विश्वास नही हो रहा था। क्योंकि वह अपने लड़के के मिजाज को अच्छी तरह जानते थे।
जब वह घर आया, तो रात हो गई थी। सभी ने उसे इस नेक काम के लिए बधाई दी। उसकी दादी ने भी कहा, “बेटा तुमने नमाज पढ़ी, मुझे बहुत ख़ुशी हुई। अब तुम नेक बन्दे हो गए हो। जब वह भोजन करने बैठा, तो सबने कहा कि कल से पूरे दिन खाने को कुछ भी नही मिला करेगा। और सुबह चार बजे उठकर, नहाकर पांच बजे से रोजे रखना।”
उसने कहा कि मैंने रोजे थोड़ी ही रखें हैं, कुछ नही किया। मैं तो लड़कों के जबरदस्ती करने पर नमाज पढ़ने चला गया था। उसकी माँ ने कहा कि रोजों के दिन चल रहे हैं। जब नमाज पढ़ी है, तो रोजे तो रखने ही पड़ेंगे। जब से नमाज पढ़ते हैं तब से रोजे शुरू हो जातें हैं। बेटे, अब तो धर्म की मर्यादा का सवाल है।” वह पशोपेश में पड़ गया। सोचने लगा – अब रोज सुबह पांच बजे उठना पड़ेगा। दिन में कुछ खा – पी भी नही सकता। जब खा – पी नही सकता तो इधर – उधर जाना भी बंद।
वह यह सब सोच रहा था कि उसके दादा बोले, “क्या सोच रहे हो? यही कि ‘गए थे नमाज पढ़ने, रोजे गले पड़ गए‘।”
इतना सुनकर घर के सब लोग हंस पड़े।
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