भारत में मॉनसून हिन्द महासागर व अरब सागर की ओर से हिमालय की ओर आने वाली हवाओं पर निर्भर करता है। जब ये हवाएं भारत के दक्षिण पश्चिम तट पर पश्चिमी घाट से टकराती हैं तो भारत तथा आसपास के देशों में भारी वर्षा होती है। ये हवाएं दक्षिण एशिया में जून से सितंबर तक सक्रिय रहती हैं। वैसे किसी …
Read More »धूप ने बुलाया: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया। ताते जल नहा, पहन श्वेत वसन आई खुले लॉन बैठ गई दमकती लुनाई सूरज खरगोश धवल गोद उछल आया। बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया। नभ के उद्यानछत्रतले मेघ टीला पड़ा हरा फूल कढ़ा मेजपोश पीला वृक्ष खुली पुस्तक हर पृष्ठ फड़फड़ाया बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया। पैरों में मखमल …
Read More »चले नहीं जाना बालम – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
यह डूबी डूबी सांझ उदासी का आलम‚ मैं बहुत अनमनी चले नहीं जाना बालम! ड्योढ़ी पर पहले दीप जलाने दो मुझ को‚ तुलसी जी की आरती सजाने दो मुझ को‚ मंदिर में घण्टे‚ शंख और घड़ियाल बजे‚ पूजा की सांझ संझौती गाने दो मुझको‚ उगने तो दो उत्तर में पहले ध्रुव तारा‚ पथ के पीपल पर आने तो दो उजियारा‚ …
Read More »अगर कहीं मैं घोड़ा होता – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
अगर कहीं मैं घोड़ा होता वह भी लंबा चौड़ा होता तुम्हें पीठ पर बैठा कर के बहुत तेज मैं दौड़ा होता पलक झपकते ही ले जाता दूर पहाड़ी की वादी में बातें करता हुआ हवा से बियाबान में आबादी में किसी झोपड़े के आगे रुक तुम्हें छाछ और दूध पिलाता तरह तरह के भोले भोले इंसानों से तुम्हें मिलाता उनके …
Read More »नए साल की शुभकामनाएं – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पांव को कुहरे में लिपटे उस छोटे से गांव को नए साल की शुभकामनाएं। जांते के गीतों को बैलों की चाल को करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को नए साल की शुभकामनाएं। इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को नए साल की शुभकामनाएं। …
Read More »माँ की याद – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
चींटियाँ अण्डे उठाकर जा रही हैं, और चिड़ियाँ नीड़ को चारा दबाए, धान पर बछड़ा रंभाने लग गया है, टकटकी सूने विजन पथ पर लगाए, थाम आँचल, थका बालक रो उठा है, है खड़ी माँ शीश का गट्ठर गिराए, बाँह दो चमकारती–सी बढ़ रही है, साँझ से कह दो बुझे दीपक जलाये। शोर डैनों में छिपाने के लिए अब, शोर …
Read More »कितनी बड़ी विवशता – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
कितना चौड़ा पाट नदी का, कितनी भारी शाम, कितने खोए–खोए से हम, कितना तट निष्काम, कितनी बहकी–बहकी सी दूरागत–वंशी–टेर, कितनी टूटी–टूटी सी नभ पर विहगों की फेर, कितनी सहमी–सहमी–सी जल पर तट–तरु–अभिलाषा, कितनी चुप–चुप गयी रोशनी, छिप छिप आई रात, कितनी सिहर–सिहर कर अधरों से फूटी दो बात, चार नयन मुस्काए, खोए, भीगे, फिर पथराए, कितनी बड़ी विवशता, जीवन की, …
Read More »कच्ची सड़क – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
सुनो ! सुनो ! यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी जो मेरे गाँव को जाती थी। नीम की निबोलियाँ उछालती, आम के टिकोरे झोरती, महुआ, इमली और जामुन बीनती जो तेरी इस पक्की सड़क पर घरघराती मोटरों और ट्रकों को अँगूठा दिखाती थी, उलझे धूल भरे केश खोले तेज धार सरपत की कतारों के बीच घूमती थी, कतराती थी, खिलखिलाती …
Read More »चक्कर पे चक्कर – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
आओ एक बनाएं चक्कर फिर उस चक्कर में इक चक्कर फिर उस चक्कर में इक चक्कर फिर उस चक्कर में इक चक्कर और बनाते जाएं जब तक ऊब न जाएं थक कर। फिर सबसे छोटे चक्कर में म्याऊं एक बिठाएं और बाहरी एक चक्कर में चूहों को दौड़ाएं। दौड़-दौड़ कर सभी थकें हम बैठे मारें मक्कर, नींद लगे हम सो …
Read More »बतूता का जूता – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
इब्न बतूता, पहन के जूता निकल पड़े तूफान में। थोड़ी हवा नाक में घुस गई, थोड़ी घुस गई कान में। कभी नाक को, कभी कान को, मलते इब्न बतूता। इसी बीच में निकल पड़ा, उनके पैरों का जूता। उड़ते-उड़ते जूता उनका, जा पहुँचा जापान में। इब्न बतूता खड़े रह गए, मोची की दूकान में। ∼ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
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