लाला लाजपत राय

लाला लाजपत राय: भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, लेखक व राजनेता की जीवनी

लाला लाजपत राय भारतीय पंजाबी लेखक और एक राजनेता थे, जो ज्यादातर भारतीय स्वतंत्रता अभियान के मुख्य नेता के रूप में याद किये जाते है। वे ज्यादातर पंजाब केसरी के नाम से जाने जाते है। लाल-बाल-पाल की तिकड़ी में लाल मतलब लाला लाजपत राय ही है। उनके प्रारंभिक जीवन में वे पंजाब राष्ट्रिय बैंक और लक्ष्मी बिमा कंपनी से भी जुड़े थे। जब वे साइमन कमीशन के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें बहुत पीड़ा दी, और इसके तीन हफ्तों बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी। 17 नवम्बर का मृत्यु दिन आज भी भारत में शहीद दिन के रूप में मनाया जाता है।

प्रारंभिक जीवन

लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 को धुडिके ग्राम में (मोगा जिला, पंजाब) हुआ। उनके पिता धर्म से अग्रवाल थे। 1870 के अंत और 1880 के प्रारंभ में, जहा उनके पिता एक उर्दू शिक्षक थे तभी राय ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रेवाड़ी (तब का पंजाब, अभी का हरियाणा) के सरकारी उच्च माध्यमिक स्कूल से ग्रहण की। राय हिंदुत्वता से बहोत प्रेरित थे, और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने राजनीती में जाने की सोची। (जब वे लाहौर में कानून की पढाई कर रहे थे तभी से वे हिंदुत्वता का अभ्यास भी कर रहे थे। उनके इस बात पर बहुत भरोसा था की हिंदुत्वता ये राष्ट्र से भी बढ़कर है। वे भारत को एक पूर्ण हिंदु राष्ट्र बनाना चाहते थे)। हिंदुत्वता, जिस पर वे भरोसा करते थे, उसके माध्यम से वे भारत में शांति बनाये रखना चाहते थे और मानवता को बढ़ाना चाहते थे। ताकि भारत में लोग आसानी से एक-दुसरे की मदद करते हुए एक-दुसरे पर भरोसा कर सके।क्योंकि उस समय भारतीय हिंदु समाज में भेदभाव, उच्च-नीच जैसी कई कु-प्रथाए फैली हुई थी, लाला लाजपत राय इन प्रथाओ की प्रणाली को ही बदलना चाहते थे। अंत में उनका अभ्यास सफल रहा और वे भारत में एक अहिंसक शांति अभियान बनाने में सफल रहे और भारत को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के लिए ये बहुत जरुरी था। वे आर्य समाज के भक्त और आर्य राजपत्र (जब वे विद्यार्थी थे तब उन्होंने इसकी स्थापना की थी) के संपादक भी थे। सरकारी कानून (लॉ) विद्यालय, लाहौर में कानून (लॉ) की पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने लाहौर और हिसार में अपना अभ्यास शुरू रखा और राष्ट्रिय स्तर पर दयानंद वैदिक स्कूल की स्थापना भी की, जहा वे दयानंद सरस्वती जिन्होंने हिंदु सोसाइटी में आर्य समाज की पुनर्निर्मिति की थी, उनके अनुयायी भी बने। और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस मे शामिल होने के बाद, उन्होंने पंजाब के कई सारे राजनैतिक अभियानों में हिस्सा लिया। और फिर मई 1907 में अचानक ही बिना किसी पूर्वसूचना के मांडले, बर्मा (म्यांमार) से उन्हें निर्वासित (देश से निकाला गया) किया गया। वही नवम्बर में, उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत ना होने की वजह से वाइसराय लार्ड मिन्टो ने उनके स्वदेश वापिस भेजने का निर्णय लिया। स्वदेश वापिस आने के बाद लाला लाजपत राय सूरत की प्रेसीडेंसी पार्टी से चुनाव लड़ने लगे लेकिन वहा भी ब्रिटिशो ने उन्हें निष्कासित कर दिया।

वे राष्ट्रिय महाविद्यालय से ही स्नातक थे, जहा उन्होंने ब्रिटिश संस्था के पर्यायी ब्रद्लौघ हॉल, लाहौर की स्थापना की। और 1920 के विशेष सेशन में उन्हें कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। और 1921 में उन्होंने समाज की सेवा करने वाले लोगो को ढूंडना शुरू किया, और उन्ही की मदद से बिना किसी लाभ के उदेश्य से एक संस्था की स्थापना की। जो लाहौर में ही थी, लेकिन विभाजन के बाद वो दिल्ली में आ गयी और भारत के कई राज्यों में उस संस्था की शाखाये भी खोली गयी।

लाला लाजपत राय का हमेशा से यही मानना था की, “मनुष्य अपने गुणों से आगे बढ़ता है न की दुसरो की कृपा से”।

इसलिए हमें हमेशा अपने आप पर भरोसा होना चाहए, अगर हम में कोई काम करने की काबिलियत है तो निच्छित ही वह काम हम सही तरीके से कर पाएंगे। कोई भी बड़ा काम करने से पहले उसे शुरू करना बहोत जरुरी होता है। जिस समय लाला लाजपत राय स्वतंत्रता अभियान में शामिल हुए उस समय उन्हें ये पता भी नहीं था के वे सफल हो भी पाएंगे या नही, लेकिन उन्होंने पूरी ताकत के साथ अपने काम को पूरा करने की कोशिश तो की। और उनके इन्ही कोशिशो के फलस्वरूप बाद में उनके स्वतंत्रता अभियान ने एक विशाल रूप ले लिया था। और वह अभियान अंत में भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाकर ही रुका।

Check Also

Important Days in July: National & International Public Awareness Days List

Important Days in July 2026: National & International Public Awareness Days List

Important Days and Dates in July 2026: Here is a complete list of important National …